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Poetry

Capsule Poetry, Poetry, Ramyantar

अभी तक मैं चल रहा हूँ, चलता ही जा रहा हूँ

(१) “बहुत दूर नहीं बहुत पास “ कहकर तुमने बहका दिया मैं बहक गया । (२) “एक,दो,तीन…..नहीं शून्य मूल्य-सत्य है “ कहा फिर अंक छीन लिए मैं शून्य होकर विरम गया । (३) तुम हो जड़ों के भीतर, वृन्त पर…

Love Poems, Poetry, Ramyantar

यह कैसा संवाद सखी !

यह कविता तब लिखी थी जब हिन्दी कविता से तुंरत का परिचय हुआ था । स्नातक कक्षा की कविताओं को पढ़कर कवि बनने की इच्छा हुई – कविता लिख मारी। यह कैसा संवाद सखी ? प्रेम-विरह-कातर-मानस यह तेरी दरस सुधा…

Capsule Poetry, Poetry, Ramyantar

समय का शोर

जब ध्वनि असीम होकर सम्मुख हो तो कान बंद कर लेना बुद्धिमानी नहीं जो ध्वनि का सत्य है वह असीम ही है । चलोगे तो पग ध्वनि भी निकलेगी अपनी पगध्वनि काल की निस्तब्धता में सुनो समय का शोर तुम्हारी…

Love Poems, Poetry, Ramyantar

प्रेम-विस्मृति

तुम बैठे रहते हो मेरे पास और टकटकी लगाए देखते रहते हो मुझे, अपने अधर किसलय के एक निःशब्द संक्षिप्त कम्पन मात्र से मौन कर देते हो मुझे और अपने लघु कोमल स्पर्श मात्र से मेरा बाह्यांतर कर लेते हो…

Poetry, Ramyantar

अब तुम कहाँ हो मेरे वृक्ष ?

छत पर झुक आयी तुम्हारी डालियों के बीच देखता कितने स्वप्न कितनी कोमल कल्पनाएँ तुम्हारे वातायनों से मुझ पर आकृष्ट हुआ करतीं, कितनी बार हुई थी वृष्टि और मैं तुम्हारे पास खड़ा भींगता रहा कितनी बार क्रुद्ध हुआ सूर्य और…

Poetry, Ramyantar

मेरी दीवार में एक छिद्र है

मेरी दीवार में एक छिद्र है उस छिद्र में संज्ञा है, क्रिया है, विशेषण है। जब भी लगाता हूँ अपनी आँख उस छिद्र से सब कुछ दिखाई देता है जो है दीवार के दूसरी ओर। दीवार के दूसरी ओर बच्चे…

Poetry, Ramyantar

गद्य से उभारनी पड़ रही है बारीक-सी कविता

छंदों से मुक्त हुए बहुत दिन हुए कविता ! क्या तुम्हारी साँस घुट सी नहीं गई ? मैंने देखा है मुझे डांटती हुई माँ की डांट पिता की रोकथाम पर झल्लाहट बन जाती है टूट जाता है उस डांट का…

Poetry, Ramyantar

जो कर रहा है यहाँ पुरुष

राजकीय कन्या महाविद्यालय के ठीक सामने संघर्ष अपनी चरमावस्था में है, विद्रूप शब्दों से विभूषित जिह्वा सत्वर श्रम को तत्पर है, कमर की बेल्ट हवा में लहरा रही है और खोज रही है अपना ठिकाना , तत्क्षण ही बह आयी…

Poetry, Ramyantar

तो मर्द बखानूँ मैं

पिस-पिस कर भर्ता हुए समय के कोल्हू में तुम समायातीत बनो तो मर्द बखानूँ मैं। जाने कितने घर-घर के तुम व्यवहार बने कितने-कितने हाथों के तुम औजार बने रंगीन खिलौनों वाली दुनियादारी में तुम दर-दर चलते फिरते बाजार बने, बन…