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कविता

Ramyantar

हार गया तन भी, डूब गया मन भी ।

समय की राह सेहटा-बढ़ा कई बारविरम गयी राह ही,मन भी दिग्भ्रांत-साअटक गया इधर-उधर । भ्रांति दूर करने कोदीप ही जलाया थाज्ञान का, विवेक का,देखा फिरखो गयीं संकीर्णतायेंव्यष्टि औ’ समष्टि की । स्व-प्राणों के मोह छोड़सूर्य ही सहेजा थाउद्भासित हो बैठी,…

Ramyantar

अपने प्रेम-पत्र में यही तो लिखा मैंने….

“जीवन के रोयें रोयें कोमिलन के राग से कम्पित होने दो,विरह के अतिशय ज्वार कोठहरा दो कहीं अपने होठों पर,दिव्य प्रेम की अक्षुण्णता कोसमो लो अपने हृदय में, औरअपने इस उद्दाम यौवन की देहरी परप्रतीक्षा का पंछी उतरने दो;फिर देखो-मैं…

Ramyantar

हे सूर्य !

हे बहु-परिचित सूर्य !नहीं पा रहा हूँ तुम्हें नये सिरे से पहचान,पहचान नहीं पा रहा ….उत्तरी हवा चल रही है । वैज्ञानिक कहता है-कृत्रिम-’हार्ट’ बना दूँगा,आँखें जाँय तो क्या, मृत कुत्ते की आँखें दूँगा ।और मस्तिष्क भी शायद,शायद वह भी…

Ramyantar

कभी तुमने अपनी गली में न झाँका

दूसरों की गली का लगाते हो फेराकभी तुमने अपनी गली में न झाँकातितलियों के पीछे बने बहरवाँसूकभी होश आया नहीं अपनी माँ का । सुबह शाम बैठे नदी के किनारेचमकते बहुत सीप कंकड़ बटोरे,सहेजा सम्हाला उन्हें झोलियों मेंगया भूल अपना…

Ramyantar

जैनू ! तुम फिर आना

जैनू ! तुम्हें देखकर ’निराला का भिक्षुक’ कभी याद नहीं आता। पेट और पीठ दोनों साफ-साफ दीखते हैं तुम्हारे और तुम्हारी रीढ़ एकदम ही नहीं झुकतीजबकि तुम तो जानते होभिखारी के पास रीढ़ नहीं हुआ करती। जैनू !समय की आँधी…

Ramyantar

टूट गयी कोर भी

अपने ऊबड़-खाबड़ दर्द की जमीन न जाने कितनी बार मैंने बनानी चाही एक चिकनी समतल सतह की भाँतिपर कभी सामर्थ्य की कमीतो कभीं परिस्थिति का रोना रोता रहा । एक दिन मौसम बदला, और सामर्थ्य ने ’हाँ’ कीतो आशाओं, संवेदनाओं…

Poetry, Ramyantar

एक पेड़ चाँदनी लगाया है आँगने

बचपन से देवेन्द्र कुमार के इस गीत को गाता-गुनगुनाता आ रहा हूँ, तब से जब ऐसे ही कुछ गीत-कवितायें गाकर विद्यालय के पुरस्कार झटकने का उत्साह रहा करता था। आज बुखार में तपता रहा सारे दिन। कई बार बोझिल मन…

Ramyantar

अथ-इति

निवृत्ति की चाह रहीअथ से भीइति से भी । अथ पर ही अटका मनइति को तो भूल गयागति भी अनजान हुई ।