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Ramyantar

अविरल गति: वीना की कविता

Chandraparbha River flow: Naugarh-Chandauli एक नदी अविरल गति से बहती जा रही थी इठलाती हुई, बलखाती हुई कुछ कहती जा रही थी सबको मोह रही थी कल-कल पायल की झनकार से खुश थी बहुत, न था उसे कोई कष्ट इस…

Ramyantar

कौन-सी वह पीर है ?

विकल हूँ, पहचान लूँ मैं कौन-सी वह पीर है ! अभीं आया नहीं होता वसन्त तभीं उजाड़ क्यों हो जाती है वनस्थली, क्यों हवा किसी नन्दन-वन का प्रिय-परिमल बाँटती फिरती है गली-गली, और किसी सपनीली  रात में क्यों कोयल चीख-चीख…

Literary Classics, Ramyantar

माँ भी कुछ नहीं जानती

“बतलाओ माँ, बालमणि अम्मा मलयालम कविता की शीर्ष कवयित्री । प्रख्यात भारतीय अंग्रेजी साहित्यकार ’कमला दास’ की माँ । जन्म : १९ जुलाई १९०९, मृत्यु : २९ सितम्बर २००४ ’सरस्वती सम्मान’ सहित अनेक सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित । कवितायें दार्शनिक विचारों…

Ramyantar

तुमने चुपके से मुझे बुलाया ..

Photo Source : Google तुमने चुपके से मुझे बुलाया । पूजा की थाली लेकर साँझ सकारे हाथों में, तुम चली बिखर गयी अरुणाभा दीपक में चली हवा साड़ी सरकी ’सर’ से  सर से दीपक भकुआया कँपती लौ ने संदेश पठाया…

Ramyantar

मुझे मौन होना है

मुझे मौन होना है  तुम्हारे रूठने से नहीं, तुम्हारे मचलने से नहीं, अन्तर के कम्पनों से सात्विक अनुराग के स्पन्दनों से । मेरा यह मौन  तुम्हारी पुण्यशाली वाक्-ज्योत्सना को  पीने का उपक्रम है, स्वयं को अनन्त जीवन के भव्य प्रकाश…

Ramyantar

स्वलक्षण-शील

’महाजनो येन गतः..’ वाला मार्ग भरी भीड़ वाला मार्ग है नहीं रुचता मुझे, जानता हूँ  यह रीति-लीक-पिटवइयों की निगाह में  निषिद्ध है, अशुद्ध है । चिन्ता क्या !  मेरी इस रुचि में (या अरुचि में) बाह्य और आभ्यन्तर, प्रेरणा और…

Ramyantar

अधूरी कविता …

एक पन्ना मिला । पन्ने पर फरवरी २००७ लिखा है, इसलिये लगभग तीन साल पहले की एक अधूरी कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ । अधूरी इसलिये कि उस क्षण-विशेष की संवेदना और भाव-स्थिति से अपने को जोड़ नहीं पा रहा…

Ramyantar

स्वर अपरिचित …

बीती रात मैंने चाँद से बातें की । बतियाते मन उससे एकाकार हुआ । रात्रि  के सिरहाने खड़ा चाँद तनिक निर्विकार हुआ , बोला – “काल का पहिया न जाने कितना घूमा न जाने कितनी राहें मैं स्वयं घूमा और…

Literary Classics, Ramyantar

पराजितों का उत्सव : एक आदिम सन्दर्भ -२

पिछली प्रविष्टि से आगे …. ना ! क़तई नहीं । आदमी कभी जुदा-जुदा नहीं होते । आदमी सब एक जैसे होते हैं – एक ही होते हैं, पूर्ण-सम्पूर्णतः — अन्दर के अन्दर, के अन्दर, के अन्दर तक, बाहर से अन्दर…

Literary Classics, Ramyantar

पराजितों का उत्सव : एक आदिम सन्दर्भ (पानू खोलिया)-१

अपने नाटक ’करुणावतार बुद्ध’ की अगली कड़ी जानबूझ कर प्रस्तुत नहीं कर रहा । कारण, ब्लॉग-जगत का मौलिक गुण जो किसी भी इतनी दीर्घ प्रविष्टि को निरन्तर पढ़ने का अभ्यस्त नहीं । पहले इस नाटक को एक निश्चित स्थान पर…