Monthly Archives

October 2008

Poetry, Ramyantar

अब तुम कहाँ हो मेरे वृक्ष ?

छत पर झुक आयी तुम्हारी डालियों के बीच देखता कितने स्वप्न कितनी कोमल कल्पनाएँ तुम्हारे वातायनों से मुझ पर आकृष्ट हुआ करतीं, कितनी बार हुई थी वृष्टि और मैं तुम्हारे पास खड़ा भींगता रहा कितनी बार क्रुद्ध हुआ सूर्य और…

Poetry, Ramyantar

मेरी दीवार में एक छिद्र है

मेरी दीवार में एक छिद्र है उस छिद्र में संज्ञा है, क्रिया है, विशेषण है। जब भी लगाता हूँ अपनी आँख उस छिद्र से सब कुछ दिखाई देता है जो है दीवार के दूसरी ओर। दीवार के दूसरी ओर बच्चे…

Poetry, Ramyantar

गद्य से उभारनी पड़ रही है बारीक-सी कविता

छंदों से मुक्त हुए बहुत दिन हुए कविता ! क्या तुम्हारी साँस घुट सी नहीं गई ? मैंने देखा है मुझे डांटती हुई माँ की डांट पिता की रोकथाम पर झल्लाहट बन जाती है टूट जाता है उस डांट का…

Blog & Blogger, Hindi Blogging, Ramyantar

कुछ कहने का मन करता है (रवीश कुमार के ‘क़स्बा’ की चर्चा :’क़स्बा की प्रविष्टियों का सन्दर्भ )

A Screenshot of Qasba मैं ठीक अपने कस्बे की तरह एक कस्बे (क़स्बा -रवीश कुमार का ब्लॉग) का जिक्र करना चाहता हूँ जो मेरे कस्बे की तरह रोज तड़के चाय की भट्ठियों के धुँए के बीच आँखे मुँचमुँचाता, सजग होता-सा…

Poetry, Ramyantar

जो कर रहा है यहाँ पुरुष

राजकीय कन्या महाविद्यालय के ठीक सामने संघर्ष अपनी चरमावस्था में है, विद्रूप शब्दों से विभूषित जिह्वा सत्वर श्रम को तत्पर है, कमर की बेल्ट हवा में लहरा रही है और खोज रही है अपना ठिकाना , तत्क्षण ही बह आयी…

Poetry, Ramyantar

तो मर्द बखानूँ मैं

पिस-पिस कर भर्ता हुए समय के कोल्हू में तुम समायातीत बनो तो मर्द बखानूँ मैं। जाने कितने घर-घर के तुम व्यवहार बने कितने-कितने हाथों के तुम औजार बने रंगीन खिलौनों वाली दुनियादारी में तुम दर-दर चलते फिरते बाजार बने, बन…

Love Poems, Poetry, Ramyantar

मैं अभी भी खड़ा हूँ

तुम्हें नहीं पता कितनी देर से तुम्हारी राह देख रहा हूँ । तुमने कहा था आने के लिए अंतरतम में अनुरागी दीप जलाने के लिए मुझे बहलाने के लिए और प्रणय के शाश्वत गीत सुनाने के लिए पर तुम नहीं…

Love Poems, Poetry, Ramyantar

अखिल शान्ति है तुम्हारा ध्यान

मैं देखना चाहता हूँ तुम्हें हर सुबह कि मेरा दिन बीते कुछ अच्छी तरह, कि मेरे कल्पना लोक की साम्राज्ञी बनो तुम,कि आतुरता का विहग तुम्हारी स्मृति का विहान देख उड़ चले, कि मेरा विरह-कातर हृदय तुम्हारे दर्शन मात्र से…