राजकीय कन्या महाविद्यालय के ठीक सामने
संघर्ष अपनी चरमावस्था में है,
विद्रूप शब्दों से विभूषित जिह्वा सत्वर श्रम को तत्पर है,
कमर की बेल्ट हवा में लहरा रही है और
खोज रही है अपना ठिकाना,
तत्क्षण ही बह आयी है किसी माथे से लाल -सी फुहार।
कन्या महाविद्यालय के सम्मुख कुरुक्षेत्र में
गुंथ रहे हैं लाडले-
लथपथ हैं हाथ की किताबें भूमि पर
और खोज रही हैं इनके हाथों में अपनी प्रासंगिकता
पर, ये भविष्य दर्पण खोज रहे हैं अपनी प्रासंगिकता इस युद्ध में।
कन्या महाविद्यालय के प्रवेश द्वार हो रहा है
रोमांचक युद्ध
बन रही है एक अनिर्वचनीय शौर्य गाथा,
हो रहा है अपनी अदम्य गर्वोक्ति और
‘आकांक्षा’, ‘मुग्धा’,’अचला’ ‘वसुधा’ जैसे नामों के लिए
एक अनुपम संघर्ष।
और इसी कन्या महाविद्यालय के अपने ही प्रवेश द्वार पर
खड़ी बालाएं देख रहीं हैं यह विशुद्ध दृश्य
और सोच रही हैं –
कि तब, जब नारी इक्कीसवीं सदी में
प्रगति की ओर अग्रसर है, स्व-निर्भर है
और जब लगातार उठ रहीं हैं नारी-आरक्षण की मांगें
और जल रही है लगातार नारी जागरण की मशाल
और तब, जब कर सकती है नारी वह सब कुछ
जो कर सकता है पुरूष-
नहीं कर सकती वह यह
जो कर रहा है यहाँ पुरुष।
कन्या महाविद्यालय के सामने संघर्ष जैसे संवेदनशील दृश्य पर आधारित यह कविता आधुनिक समाज की एक गहरी विडंबना को उजागर करती है। एक ओर जहाँ नारी सशक्तिकरण, शिक्षा और समान अधिकारों की बातें पूरे जोर-शोर से की जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर पुरुष मानसिकता में व्याप्त आक्रामकता और हिंसात्मक प्रवृत्ति अब भी सामाजिक यथार्थ का हिस्सा बनी हुई है।
यह कविता केवल एक घटनात्मक चित्रण नहीं, बल्कि समाज में मौजूद जेंडर संघर्ष, पुरुष अहंकार और नारी की बदलती भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठाती है। कन्या महाविद्यालय के प्रवेश द्वार पर घटित यह संघर्ष न केवल युवाओं की दिशा पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि यह भी सोचने को विवश करता है कि क्या प्रगति केवल नारों तक सीमित रह गई है?


wah bahi wah
वाह !
मीठा – मीठा व्यंग्य !
अंत में तो मजा ही आ गया ..