अपने ऊबड़-खाबड़ दर्द की जमीन
न जाने कितनी बार
मैंने बनानी चाही
एक चिकनी समतल सतह की भाँति
पर कभी सामर्थ्य की कमी
तो कभीं परिस्थिति का रोना रोता रहा ।

एक दिन
मौसम बदला, और
सामर्थ्य ने ’हाँ’ की
तो आशाओं, संवेदनाओं और विवेक के
तैयार मसाले से
मैंने चढ़ा दिया उस जमीन पर
खुशी का एक पलस्तर,
फिर सूखने को कुछ क्षण उसे
कि सूख कर कड़ा हो जाय –
पत्थर ही नहीं, लोहा बन जाय-
निश्चिंत ही हुआ था
कि किसी ने छोड़ दिये
अपने पद चिह्न उस पर
टूट गयी कोर भी ।