हँसते हुए यह कभी नहीं सोचा था, कि यह हँसी कितनी पुरानी है और किसका अनुकरण कर मानव की हँसी की प्रवृत्ति विकसित हुई होगी?  खींसे निपोरकर, दाँत दिखाते हुए हँसना, खिलखिलाते हुए तोंद हिलाते हुए हँसना, आवाज निकालते चिल्लाते हुए हँसना आदि – कहाँ से सीख लिया हमने? कभी खयाल ही नहीं किया था इस बात का। पर बहुत कुछ भेद खुला मैरीना डेविला रॉस (Marina Davila Ross)और उनके सहयोगियों के ताजा शोध के खुलासे से। यह शोध करेंट बॉयलॉजी के नवीनतम अंक में प्रकाशित हुआ है, जो यह स्पष्ट करता है की आदमी की हँसी की उत्पत्ति 10 से 16 मिलियन (100 से 160 लाख ) वर्ष पहले उन सामान्य रूप से मनुष्य के अंतिम पूर्वज गिने जाने वाले वनमानुषों के साथ ही हो गयी थी।

अभी तक हमने चिड़ियाघरों में यह देखा है कि मनुष्य का यह निकट सम्बंधी किस प्रकार मनुष्य की अनेकों योग्यतायें धारण करता है। चिम्पाजी, बोनोबस, ऑरंगुटान या गुरिल्ला किसी का भी निरीक्षण करने पर यह देखा जा सकता है उनके चेहरे की अभिव्यक्ति और सामाजिक अन्तर्क्रियायें अधिकांशतः मानवोचित हैं। इस शोध ने अब यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि अन्यान्य क्रियाओं एवं व्यवहारों के अतिरिक्त एक अन्य व्यवहार भी ऐसा है जो मनुष्य और गैर-मनुष्य के मध्य समान है, एक जैसा है- वह है हँसी।

मरीना डेविला रॉस (Marina Davila Ross)  और उनके सहयोगियों ने अपने अध्ययन में शिशु और युवा गुरिल्लाओं, चिम्पाजियों, ऑरंगुटान, बोनोबस और मनुष्यों में गुदगुदाने या चुटकी काटने पर होने वाले शब्दोच्चारण (tickle-induced vocalizations)  को रिकॉर्ड और विवेचित किया है, और समानता पायी है। यह समानतायें इस विचारधारा का समर्थन करती  हैं कि हँसी एक संवेगात्मक अभिव्यक्ति है जो इन पाँचो प्रजातियों में समान रूप से व्याप्त है।
रॉस के अध्ययन के अनुसार, इन सामान्य अंतिम पूर्वजों की हँसी संभवतः लघु श्रेणी की लम्बी-धीमी पुकार में निहित थी। मनुष्य की हँसी का अपना विशेष गुण, जैसे लगातार आवाज का गुंजित करना, आदि शायद हमारे पूर्वजों की विभिन्न मुद्राओं या प्रस्तुतियों के अनुकरण का परिणाम होगा।

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इस अध्ययन की उपलब्धि यह भी है कि यह आदिम गैर-मनुष्यों  के प्रारंभिक उदगारों (nonhuman primates’ displays) और मनुष्यों की अभिव्यक्ति (human expressions) के मध्य सातत्यता के सिद्धान्त (Theory of Continuity) के प्रमाणों को भी शामिल कर लेती है – वैसा ही कुछ जैसा चार्ल्स डार्विन ने 1872 में अपनी पुस्तक ” द एक्प्रेशन ऑफ इमोशंस इन मैन एंड एनिमल्स ( The Expression of emotions in man and animals) में स्थापित किया था। डार्विन का ग्रंथ केवल विषयवस्तु के लिये ही विख्यात नहीं था बल्कि अपने उन चित्रों और रेखांकनों के लिये भी प्रसिद्ध था, जो मनुष्यों, गैर-मनुष्यों, और आदिम प्रजातियों के मध्य (जब वह असहायता या रोष में अपनी संवेगात्मक अभिव्यक्ति कर रहे होते थे) विचित्र समानताये दिखाते थे। डार्विन ने मनुष्यों और पशुओं के अनिच्छित संवेगों को 1872 के इस ग्रंथ में प्रकाश में लिया था। डार्विन के अनुसार –
We can understand how it is, that as soon as some melancholy state passes through the brain, there occurs a just perceptible drawing down of the corners of the mouth, or a slight raising up of the inner ends of the eyebrows, or both movements combined, and immediately afterwards a slight suffusion of tears … The above actions may be considered as vestiges of the screaming fits, which are so frequent and prolonged during infancy.हम यह समझ सकते हैं कि ऐसा क्यों  होता है कि जैसे ही कोई उदासी या दुख का क्षण हमारे मस्तिष्क से गुजरता है, वैसे ही चेहरे के कोने पर एक स्पष्ट दिखायी देने वाली ड्राइंग उभर आती है, या पलकों की भीतरी सीमा थोड़ा उठ जाती है, या दोनों गतिविधियाँ साथ-साथ होती हैं, और तुरंत ही बाद में थोड़ा आँसुओं का आवेग हो जाता है .. उपरोक्त क्रियायें अचानक संवेग में चिल्ला उठने के अवशेष चिन्हों की भाँति समझी जा सकती हैं, जो प्रायः दिख जाते हैं और प्रारंभिक अवस्था में बने रहते हैं।

अब जबकि डार्विन की ही राह पर डेविला रॉस ने अपने अध्ययन और विवेचन से यह सिद्ध कर दिया है कि हँसी का यह विलक्षण व्यापार लाखों वर्षों पुराना है, हम जान गये हैं कि हम लाखों वर्षों से हँसे जा रहे हैं, पर हम अभी भी निश्चिततः नहीं जानते- क्यों?

आप कहीं मत जाइये, यह देखिये, साथ में हँसे जाइये-

मूल आलेख :

Humans Don’t Have the Last, or Only, Laugh  चित्र साभार : en.wikipedia.org