मैं तो निकल पड़ा हूँ
सुन्न एकांत-से मन के साथ
जो प्रारब्ध के वातायनों से झाँक-झाँक
मान-अपमान, ठाँव-कुठाँव, प्राप्ति-अप्राप्ति से
आविष्ट जीवन को निरखता है …

निकला तो अबेर से हूँ
क्योंकि मन के उद्वेग के साथ
अनुभव का ऊहापोह भी था,
विछोह की अश्रु बूँद पलकों पर
झिलमिला रही थी,
और जाने-अनजाने
एक अकिंचन भावना थी,
जो मुझे बाँध रही थी ….

पर,
तुम्हारे अनन्त सौन्दर्य ने
गन्धोच्छ्वासित लीक दी,
मिलन के उत्ताप में
विछोह के अश्रु सूख गये,
तुम्हारे अंक की पुलक अभीप्सा ने
रोम-रोम पुलकित कर दिये …
मैं निकल पड़ा ।

कैसे कहूँ तुमसे
कि साँझ पक्षी-कलरव की लोरी से
दुलरा चुकी है अंधकार को
(और संझा-सकारे डर लगता रहा है मुझे),
परिमल-सुवासित हवा यौवन के पैरों को
ठहरा दे रही है बार-बार (मैं कैसे चलूँ ),
और पथ का प्रदीप विराग-राग गा रहा है ….

तुम आओ ना !
मुझे अपने घर ले चलो ।