सच्चा शरणम्
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शैलबाला शतक – भोजपुरी स्तुति काव्य : एक

Shailbala Shatak

जीवन में ऐसे क्षण अपनी आवृत्ति करने में नहीं चूकते जब जीवन का केन्द्रापसारी बल केन्द्राभिगामी होने लगता है। मेरे बाबूजी की ज़िन्दगी की उसी बेला की उपज है शैलबाला शतक! अनेकों झंझावातों में उलझी हुई जीवन की गति को जगदम्बा की ही शरण सूझी। अभाव-कुभाव-दुर्भाव में विक्षिप्त स्वभाव को शैलबाला के बिना कहाँ से सम्बल मिलता! इसलिए सहज वाणी में सहज प्रवाह को सरस्वती की सनकार मिली! अपनी लोकभाषा में माँ का स्तवन-वन्दन-आत्मनिवेदन और समर्पण का जो ज्वार उमड़ा वह थमने का नाम नहीं ले रहा था। कहीं कोई बनावट नहीं, कोई सजावट नहीं, कोई दिखावट नहीं, बस बिछ गया तो बिछ गया अपनी माई के चरणों में। जैसे हर पंक्ति आशीर्वाद होती गयी और माँ की वन्दना से निहाल होते गये बाबूजी। अपने से अपनी बात का यह सहज स्वाभाविक उच्छलन ही है शैलबाला शतक

चमकि चमकि चहलि चहलि चोटी धै चपेटै चण्डी
बोटी बोटी काटै अरि चमूँ हाँफै हँकर हँकर
भरति कुलाँचा अरि ढाँचा ढाहि खाँचा करै
नाचा करै फिरकी सी पिवति लहू डकर डकर
तरकति तड़ित सी हेलि खेलति कबड्डी अरि
हड्डी गुड्डी चूरि करति ताकत सुर टकर टकर
ऐसो लरवइया हाय दइया नाहिं देख्यौ गयो
’पंकिल’ को उबारो मोरि मैया बाँह पकर पकर ॥१॥
करति कलेवा हय हाथिन को करेजा चाभि
दाबति दरेरति दबेरति झपट्टा में
झोरति झॅंकोरति मुँह फोरति मरोरति अंग
तोरति अरि खोपड़ी अकूत बल गट्टा में
फेंकरति फुफुकारति मुँह फारति करति अट्टहास
बिलसति बल बट्टा डारि असुरन के ठट्टा में
पंकिल को दया की दवाई दे दोहाई माई
धूमिल मुख मोर पोंछ आपने दुपट्टा में ॥२॥
चोप करि चीरति विकराल रिपु घटाटोप
धावति धमकावति जमावति जग धाक री
सुर रिपु छाती बिहरावति पकी काँकरी सी
आँतरी निकारि उर मेलति हहा करी
लपकि लपेटि लाख लाखनि को लीलि जाति
भीषण रव पूरित दिगंतर तपाक री
लसत ललाम लोल कालिका कलाप अम्ब
चाहत द्विज ’पंकिल’ पद पंकज की चाकरी ॥३॥
किलकति कराली करवाली मुण्डमाली काली
रुण्ड मुण्ड रौंदति रण भूमि मातु दौरी है
बिथकत ब्रह्माण्ड भट कॅंहरि कॅंहरि घूमि घूमि
भटकत भहरात घिघियात मति बौरी है
बुक्का फारि बुबुक बुबुक बिलखाति बीर
बान वृष्टि झारी अम्ब पारी ज्यों बनौरी है
पंकिल की पीठ पर हॅंथोरी मंजु फेरि फेरि
बाँटा कर दुलार दीन बेटे की चिरौरी है ॥४॥

  • [message]
    • काठिन्य निवारण
      • १) चहलि चहलि-रौंदकर; चमूँ-सेना; कुलाँचा-उछलना,कूदना; खाँचा-रौंदना; डकर डकर-गट गट; हेलि-प्रवेश कर; टकर-टकर-एकटक,अपलक;  लरवइया-योद्धा।
        २) करेजा-कलेजा; चाभि-चबाना;  दबेरति-डाँटना;  झंकोरति-झंकोरना; मरोरति-मरोड़ती हुई,उमेठती हुई; गट्टा-बाँह; फेंकरति-चिल्लाती हुई; बिलसति-सुशोभित होती है; बल बट्टा-बल में कमी करके; ठट्टा में-ठाट-बाट (सेना) में ; दोहाई-जय जयकार, पुकार।
        ३) चोप-क्रोध; बिहरावति-छिन्न-भिन्न करना; आँतरी-अँतड़ी; मेलति-पहन लेना; दिगंतर -सभी दिशाओं में, चारों ओर; लसत-अच्छा लगना;  लोल-चंचल; कलाप-कार्य।
        ४) करवाली-तलवार-युक्त; दौरी-दौड़ी; बिथकत-विखंडित; भट-वीर; कँहरि-कँहरि-कराहते हुए; भहरात-लड़खड़ाते हुए; घिघियात-चिल्लाते हुए ; बुक्का फारि-मुँह फाड़-फाड़ कर; बुबुक-बुबुक–हिचकी लेकर,सिसकी लेकर; बान-बाण; हंथोरी-हथेली; चिरौरी-प्रार्थना।

24 comments

  1. कितना आवश्यक होता है शक्ति के दुष्ट – दलनकारी रूप का आराधन ! पंडितराज जगन्नाथ अपने अहम् के लिए विख्यात थे पर जब उनकी गंगालहरी देखिये तो लगता है कि माँ के सामने कितना विनत भाव है कविवर में ! ऐसा लगता है कि जैसे एक नयी पारी की शुरुआत की शक्ति अर्जित कर रहे हों ! सहमत हूँ आपसे — '' अभाव-कुभाव-दुर्भाव में विक्षिप्त स्वभाव को शैलबाला के बिना कहाँ से सम्बल मिलता ! ''

    ० चहलि चहलि , डकर डकर ,टकर टकर में जैसे ध्वनि ही क्रिया-व्यापार को लक्षित कर दे रहा हो !
    ० '' धूमिल मुख मोर पोंछ आपने दुपट्टा में '' — एक पुत्र की माँ के स्नेहांचल की सहज मांग !
    ० सुर रिपु छाती बिहरावति पकी काँकरी सी / आँतरी निकारि उर मेलति हहा करी — शक्ति के शौर्य – प्रदर्शन में इतनी जुगुप्सा मिलती ही है !
    ० बुक्का फारि बुबुक बुबुक बिलखाति बीर — ''ब'' का अनुप्रास सराहनीय है !

    एक सार्थक रचना के पढने जैसा सुख मिला ! अर्थ लिख कर अच्छा किया आपने ! आभार !

  2. जय जय हे महिषासुर मर्दिनि रम्य कपर्दिनी शैल सुते!

  3. लाजवाब और सशक्त रचना,बेहतरीन प्रस्तुति.

  4. जय माँ
    उत्तम और अद्भुत!
    बार-बार आना पड़ेगा।

  5. मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ…. तुम्हारी हिंदी को नमन…

  6. शब्दों के अर्थ माँ काली की वंदना और प्रार्थना को समझने में बहुत सहायक हुए …

    @ धूमिल मुख मोर पोंछ आपने दुपट्टा में '' — एक पुत्र की माँ के स्नेहांचल की सहज मांग !..
    कौन माँ निहाल ना हो जाए ….!!

  7. इसे तो जोर-जोर से पढ़ना, सुनना और सुनाना पड़ेगा…
    'शिव तांडव स्तोत्र' पढ़ते समय जो आनंद आता है.. वैसा ही शब्द-हुंकार सुनाई दे रहा है इन शब्दों में.. वीर रस में इतना सुंदर छंद अब कम ही पढ़ने को मिलता है.

  8. महाकाली का इतना बढ़िया स्तवन नहीं पढ़ा पहले। हां इसे सुनना अद्भुत अनुभव होगा!

  9. मन्त्र-मुग्ध हूँ. आप को पढ़ के बस ब्लॉग खुला ही रह जाता है.
    और फिर भी मन नहीं भरता है, यही अभिलाषा रहती है कि अब अगली रचना पढूं या फिर किसी पिछली रचना पर ही दृष्टि डालूँ.

  10. सुनाने वाले अनुरोध पर गंभीरता से ध्यान दिया जाए भाई.

  11. कहीं कोई बनावट नहीं, कोई सजावट नहीं, कोई दिखावट नहीं..बस बिछ गया तो बिछ गया.
    असुर वध के उपमाओ,रुपको द्वारा दृश्यों के सजीव चित्र उपस्थित कर दिए गये है.रचना में ऐसा अलंकार ढूंढ़ पाना कठिन है जिसका प्रयोग केवल अलंकार प्रदर्शन के लिए किया गया लगता हो.वस्तुत: कविता अपने आप में इतनी सुंदर है की उसे अलंकारो की कोई आवश्कता ही नहीं है.फिर भी अलंकारो ने काव्य सौन्दर्य की वृद्धि में सहायता दी है.कविता के पात्र मानव नहीं है फिर भी मानवोचित भावो से पूर्ण है.घिघयाना,सिसकी लेकर रोना आदि मानवोचित भाव है.क्रोध और उग्रता के अनुकूल भाषा भी कठोर हो गयी है.क्रुद्ध चंडी माँ का ही चित्र नहीं सामने आ जाता बल्कि आँखों से लपटों के साथ निकलती हुई अग्नि सी भी दिखती प्रतीत सी होने लगती है.कविता विलक्ष्ण है.

  12. वाह जी, बहुत अदभुत, आप की कलम को नमन

  13. पुनः पढ़ रहा हूँ , हर्षित हो रहा हूँ !
    इसका एक कारण यह भी है कि रचना अनन्य है |
    ब्रज-भाषा में भूषण को पढ़ सकता हूँ , पर यहाँ तो भोजपुरी है |
    भूषण के यहाँ अधिकाशतः जन का बखान है , जहां अतिशयोक्ति ज़रा सी
    अखर सकती है पर यहाँ शैलबाला के चित्रण में 'अतिशयोक्ति'
    शब्द को 'गेटपास' ही नहीं मिलेगा | कठोर और कोमल को
    साधती हुई कविता है यह ! दुष्ट – दलन में अपेक्षित कठोरता और
    पुत्र – रक्षा में ममत्व का कोमल पक्ष ! इन दो छोरों का सामंजस्य
    तो भूषण के रौद्र – चित्रण में भी नहीं मिलता !
    वे भाषा के दुराग्रही आयें – जिनको भोजपुरी आदि क्षेत्रीय भाषाएँ
    अश्लील गानों भर की भाषा लगती है – और अपनी दुराग्रही 'रेटिना' को
    भाषात्मक औदार्य के जल से धोकर पढ़ें इस रचना को ! यह चार छंद ही
    उनके कुतर्कों की बुनियाद को हिला देंगे | भहराय के गिर जायेंगे |
    मित्र ! लोक बोलियों के सौन्दर्य को बचाए रखना है , पीढ़ी की पीढ़ी तो
    धंसी जा रही है 'पेप्सी' के बोतल के संकीर्ण छिद्र में ! हम गंवार कुछ
    कर लेंगे तो भी अंतिम सांस बड़े सुकून से ले सकेंगे !
    'बाबू जी' ने विरलतम साधना की है , मित्रवर ! मेरे प्रणाम को पहुँचाना
    बाबू जी तक ! प्रणाम !

  14. अमरेन्द्र भाई ,
    सही पकड़ा आपने – "कठोर और कोमल को
    साधती हुई कविता है यह ! "
    इस विशेषता को ही लक्ष्य किया था मैंने भी पहले-पहल..फिर दूसर बहुत सी विशेषताएं खुलती गयीं ..कविता ने सम्मोहित कर लिया ! भाषा अपनी थी..भोजपुरी थी..लोक अभिव्यक्त हो रहा था इसमें..सो इसे कलेज से लगा लिया मुझ-से बालक ने ! वस्तुतः यह आराधना, यह स्तुति, यह रूप-ममत्व का बखान सबका था, हम सबका ।
    यदि हो सका तो शायद बाबूजी या किसी और स्वर के साथ प्रस्तुत करूँगा इस रचना को आगे !

  15. टिपण्णी देने के लिए धन्यवाद . आपका दूसरा ब्लॉग अखिल मधुरं भी पढ़ा , आपके बाबूजी की सभी रचनाए बहुत ही अच्छी लगी किन्तु टिपण्णी देने में समस्या हुई , पता नहीं क्या प्रोब्लम है …

  16. अद्भुत!
    मैंने अपने जीवन में ऐसी रचना कभी ना सुनी ना देखी!
    इसका एमपी३ डाऊनलोड भी उपलब्ध करवाईये.

  17. Nice dispatch and this mail helped me alot in my college assignement. Thanks you as your information.

  18. salute to your babu ji for the nice creation of kali upasana.
    sorry to comment in english this system did not support translation.

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