साहित्य क्यों ? (Why Literature ?) : मारिओ वर्गास लोसा (Mario Vargas Llosa)
प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख का हिन्दी रूपान्तर । ‘लोसा’ साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते हैं कि साहित्य मूलतः अन्य मनोरंजन माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है, जिसके लिए समय और विलासिता दोनों पर्याप्त जरूरी हैं । साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को भी रेखांकित करता है यह आलेख । इस चिट्ठे पर क्रमशः सम्पूर्ण आलेख हिन्दी रूपांतर के रूप में उपलब्ध होगा । पहली दूसरी कड़ी के बाद प्रस्तुत है तीसरी कड़ी ।

Translation of Mario Vargas Llosa's essay Why Literature

जनसामान्य के उद्भव और उसके लक्ष्य के प्रति चेतना का सृजन करके तथा मानव जाति को परस्पर संवाद के लिए बाध्य करके साहित्य उसमें जो भाईचारा स्थापित करता है, वह सारे भौतिक बंधनों को पार कर जाता है । साहित्य हमें विगत में पहुँचा देता है और उन लोगों से हमारा सम्बन्ध स्थापित कर देता है, जिन्होंने अतीत काल में योजनायें रचीं, आनन्द प्राप्त किया और उन रचनाओं की स्वप्न-सृष्टि में डूबे रहे जो हम तक उतर कर आयी हैं; और जो आज भी हमें आनन्द लेने और स्वप्न संरचना की पृष्ठभूमि प्रदान करती हैं । यह संयुक्त मानव अनुभूति में अपनी उपस्थिति की भावना जो समय और काल की सीमा के पार होती है, संस्कृति की सर्वोत्तम उपलब्धि होती है, और   पीढ़ी दर पीढ़ी इसके पुनर्नवीनीकरण में जितना योगदान साहित्य देता है उतना और कुछ भी नहीं ।

बोर्गेज (Borges) प्रायः उत्तेजित हो जाता करता था जब उससे पूछा जाता था, “ साहित्य का उपयोग क्या है?” उसके लिए यह प्रश्न मूर्खतापूर्ण लगता था और इसके लिए वह यही उत्तर देगा, “यह तो कोई नहीं पूछेगा कि कैनरी (Canary) के गीतों का या सूर्यास्त का क्या उपयोग है ? यदि इन मनोहर चीजों का अस्तित्व है, और धन्यवाद है उनको कि यदि जीवन उनके लिए अत्यल्प भद्देपन और उदासीनता का उदाहरण है तो क्या किसी चीज की प्रायोगिक तथ्यता खोजना नगण्य एवं तुच्छ नहीं है ?” परंतु प्रश्न एक अच्छा प्रश्न है  । उपन्यास और कवितायें पक्षियों के गीत की तरह नहीं हैं और न तो अंतरिक्ष में डूबते हुए सूर्य की चमक की तरह हैं, क्योंकि उनकी रचना संयोगवश या प्रकृति के द्वारा नहीं हुई । ये मनुष्य की रचनाएँ हैं, इसलिये यह पूछना उचित है कि वे कैसे और क्यों आये संसार में, और उनके आने का उद्देश्य क्या है, और वे इतने दिनों तक अस्तित्व में बनी क्यों हैं ।

मारिओ वर्गास लोसा

पेरू के प्रतिष्ठित साहित्यकार। कुशल पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी। वर्ष २०१० के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता।

जन्म : २८ मार्च, १९३६
स्थान : अरेक्विपा (पेरू) 
रचनाएं : द चलेंज–१९५७; हेड्स – १९५९; द सिटी एण्ड द डौग्स- १९६२; द ग्रीन हाउस – १९६६;  प्युप्स –१९६७; कन्वर्सेसन्स इन द कैथेड्रल – १९६९; पैंटोजा एण्ड द स्पेशियल -१९७३; आंट जूली अण्ड स्क्रिप्टराइटर-१९७७; द एण्ड ऑफ़ द वर्ल्ड वार-१९८१; मायता हिस्ट्री-१९८४; हू किल्ड पलोमिनो मोलेरो-१९८६; द स्टोरीटेलर-१९८७;प्रेज़ ऑफ़ द स्टेपमदर-१९८८;डेथ इन द एण्डेस-१९९३; आत्मकथा–द शूटिंग फ़िश-१९९३।

जो साहित्यिक रचनायें हैं वे रचनाकार की चेतना की गहन आत्मीयता में एक आकृति-विहीन प्रेतात्मा की तरह उत्पन्न होती हैं । उनमें अचेतन की संयुक्त शक्ति होती है और होती है लेखक की संवेदना जो उसके चतुर्दिक व्याप्त विश्व के प्रति होती है, और होते हैं लेखक के संवेग – और ये ही चीजे हैं जिनको कवि या कथाकार शब्दों के साथ जूझता हुआ क्रमशः रूप, आकार, गति, लय, छंद और जीवन प्रदान करता है  । यह निश्चित ही एक बनावटी जीवन है, निश्चित ही एक काल्पनिक जीवन है, फिर भी नर-नारी यह बनावटी जीवन खोजते हैं – कुछ तो तीव्र गति से, कुछ बिखरे हुए भाव से । ऐसा इसलिए कि वास्तविक जीवन उनके लिए छोटा पड़ जाता है, और उनको वह देने में समर्थ नहीं हो पाता है जो वे चाहते हैं । साहित्य एक व्यक्ति की रचना के द्वारा अस्तित्व में आना प्रारंभ नहीं करता । यह तभीं अस्तित्व में रह सकता है जब दूसरे लोग भी इसको स्वीकार करते हैं, और यह एक सामाजिक जीवन का हिस्सा बन जाता है, और जब यह पठन, बहुत धन्यवाद की बात है कि, एक दूसरे में परस्पर बँटी हुई अनुभूति हो जाती है ।

इसके लाभप्रद प्रभावों में से एक है भाषा के स्तर का लाभ । लिखित साहित्य से विहीन समाज की अभिव्यक्ति  में निश्चितता का अभाव होता है , विविध कोमल अर्थों एवं आकृतियों की समृद्धि का अभाव होता है और अपेक्षाकृत उस स्पष्टता का अभाव होता है जो साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से विरचित एवं पूर्ण होती हुई उस समाज को प्राप्त होती है जिसका परस्पर सम्वाद का अस्त्र शब्द है  । ऐसी पठन पाठन से विहीन मानवता उस बहरे और शब्दविहीन गूंगों का समूह होगी, जिसमें अपरिपक्व एवं अविकसित भाषा के चलते परस्पर संवाद की घोर कठिनाई झेलनी पड़ती है । यह व्यक्तियों के लिए भी सत्य है । जो व्यक्ति पढ़ता नहीं है या कम पढता है या पढ़ता भी है तो व्यर्थ की चीजें पढ़ता है, तो वह एक हकलाने वाला व्यक्ति है । वह बोल तो बहुत सकता है , पर कहेगा बहुत कम, क्योंकि उसका शब्दकोष आत्माभिव्यक्ति में अक्षम है ।

इसकी यह केवल वाचिक सीमा ही नहीं है । बुद्धि और कल्पना में भी इसकी सीमा प्रकट होती है । इसमें विचारों का कंगालीपना है । सीधा सा कारण् यही है कि विचार, अवधारणाएँ जिनसे हम अपनी स्थिति के रहस्यों को ग्रहण कर पाते हैं, वे शब्दों से अलग स्थित नहीं होते हैं । अच्छे साहित्य और केवल अच्छे साहित्य से ही हम यह सीख पाते हैं कि कैसे सही रूप से, गंभीरता से, दृढ़ता और सूक्ष्मता से बोला जाता है । कलाओं की किसी भी साज-सज्जा में, किसी भी शाखा में साहित्य के स्थान की पूर्ति करने की शक्ति नहीं है जो लोगों के लिए आवश्यक भाषा की संरचना कर सके । ठीक-ठीक कहें तो समृद्ध और परिवर्तनशील भाषा के स्वामित्व के लिए, संवाद-सृजन हेतु प्रत्येक विचार, प्रत्येक संवग की प्राप्ति हेतु सामर्थ्य के लिए, चिंतन,अध्यापन, सीख एवं संवाद के लिए तथा कल्पनाशीलता, स्वप्न और अनुभूति के लिए अच्छी तरह तैयारी करनी होती है । गुप्त रूप में शब्द हमारे क्रिया-कलाप में अनुगुंजित होते है । उन कार्यों में भी उनकी अनुगूंज सुनाई पड़ती है जो भाषा से बहुत दूर स्थित प्रतीत होते हैं । और चूंकि भाषा अनावृत हुई, उसका विकास हुआ तो धन्यवादार्ह है साहित्य कि उससे भाषा अपने परिष्कार और तौर तरीकों में उच्च स्थान प्राप्त कर सकी- इसने मानव के आनंद की संभावना में चार-चाँद लगाया ।

क्रमशः—
पूरे लेख को निम्न कड़ियों से क्रमशः पढ़ा जा सकता है –
  1. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-1
  2. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-2
  3. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-3
  4. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-4
  5. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-5
  6. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-6
  7. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-7