साहित्य क्यों? (Why Literature ?):मारिओ वर्गास लोसा (Mario Vargas Llosa)
प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख का हिन्दी रूपान्तर । ‘लोसा’ साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते हैं कि साहित्य मूलतः अन्य मनोरंजन माध्यमों की तरह एक मनोरंजन है, जिसके लिए समय और विलासिता दोनों पर्याप्त जरूरी हैं । साहित्य-पठन के निरन्तर ह्रास को भी रेखांकित करता है यह आलेख । इस चिट्ठे पर क्रमशः सम्पूर्ण आलेख हिन्दी रूपांतर के रूप में उपलब्ध होगा । पहली कड़ी के बाद प्रस्तुत है दूसरी कड़ी ।

हम ज्ञान के विशिष्टीकरण के युग में रह रहे हैं । धन्यवाद देता हूँ और विज्ञान और तकनीक के आश्चर्यजनक और शक्तिशाली विकास को और परिणामस्वरुप अगणित खण्डों में ज्ञान के बँट जाने को । यह जो सांस्कृतिक प्रवृत्ति है इसपर संभवतः आनेवाले वर्षों में और बल दिया जायेगा । यह बात सच है कि विशिष्टीकरण के अनेकों लाभ हैं । इससे गहरी छानबीन और महान प्रयोगों की स्थिति बनती है । यह प्रगति का इंजिन ही है, फिर भी इसके नकारात्मक परिणाम भी हैं । क्योंकि यह उन सामान्य बौद्धिक और सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को किनारे लगा देता है जो पुरुष और स्त्री को साथ-साथ रहने का संयोग बनाते हैं, उनके आपस में संवाद का सृजन करते हैं और दो वर्गों के मेल की अनुभूति का भाव पैदा करते हैं । विशिष्टीकरण सामाजिक समझ को कम करने में प्रमुख भूमिका निभाता है । यह मनुष्यों को एक ऐसी भीड़ में विभक्त कर देता है जिन्हें टेक्नीशियन या विशेषज्ञ कहेंगे । ज्ञान के विशिष्टीकरण को एक विशिष्ट भाषा की आवश्यकता होती है, जिनमें दुर्बोध संकेतों की बाढ़ होती है, क्योंकि सूचना अधिक से अधिक विशिष्ट और खंडों में विभक्त होती है । इसी विशेषता और विभाजन की ओर संकेत करते हुए एक पुरानी कहावत ने सचेत किया है – शाखा या पत्ती पर बहुत अधिक ध्यान मत दो, कहीं ऐसा न हो कि तुम यह भूल जाओ कि वे एक वृक्ष के अंग हैं, या वृक्ष पर अधिक ध्यान मत दो, कहीं ऐसा न हो कि  वृक्ष एक जंगल का हिस्सा है यह भूल  जाय । वन की उपस्थिति के प्रति सचेत रहना एक समानता की भावना को पैदा करता है, एक ऐसी भावना को उपस्थित करता है जो समाज को आपस में बाँधे रहती है और इसे असंख्य आत्मकेन्द्रित या अहंवादी विशेष खंड से बचाए रखती है । राष्ट्रों और व्यक्तियों का अहमन्यवादी होना एक संभ्रम और उन्माद को जन्म देता है । उससे वास्तविकता खंड-खंड हो जाती है और घृणा, युद्ध और यहाँ तक कि जाति-संहार भी उत्पन्न हो जाता है ।

मारिओ वर्गास लोसा

पेरू के प्रतिष्ठित साहित्यकार। कुशल पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी। वर्ष २०१० के लिए साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता।

जन्म : २८ मार्च, १९३६
स्थान : अरेक्विपा (पेरू) 
रचनाएं : द चलेंज–१९५७; हेड्स – १९५९; द सिटी एण्ड द डौग्स- १९६२; द ग्रीन हाउस – १९६६;  प्युप्स –१९६७; कन्वर्सेसन्स इन द कैथेड्रल – १९६९; पैंटोजा एण्ड द स्पेशियल -१९७३; आंट जूली अण्ड स्क्रिप्टराइटर-१९७७; द एण्ड ऑफ़ द वर्ल्ड वार-१९८१;मायता हिस्ट्री-१९८४; हू किल्ड पलोमिनो मोलेरो-१९८६;द स्टोरीटेलर-१९८७;प्रेज़ ऑफ़ द स्टेपमदर-१९८८;डेथ इन द एण्डेस-१९९३; आत्मकथा–द शूटिंग फ़िश-१९९३।

हमारे समय में विज्ञान और तकनीकी संघटित करने या जोड़ने का कार्य नहीं कर सकते । खास कर इसलिए कि उसमें अनन्त ज्ञान का खजाना है और उसके विस्तारीकरण की पर्याप्त गति है । इसका फल है कि विशिष्टीकरण और अस्पष्टता उत्पन्न हो जाती है । लेकिन साहित्य एक प्रमुख सामान्य मूल्य के रूप में मनुष्य के अनुभवों के साथ रहा है, है और आगे भी रहेगा जिससे मनुष्य अपने को पहचानते हैं और एक दूसरे के साथ विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, चाहे उनका पेशा, उनकी जीवन की योजनाएँ, उनका भौगोलिक और सांस्कृतिक स्थान,उनकी व्यक्तिगत समस्याएँ कितनी भी भिन्न क्यों न हों । यह मनुष्यों को उनकी हर विशेषताओं के साथ अपनी ऐतिहासिकता से परे पहुँचा देता है । सर्वेंटिस (Cervantes), शेक्सपियर (Shakespeare), दाँते (Dante) और ताल्सतॉय (Tolstoy)  के पाठक के रूप में हम यह पाते हैं कि प्रत्येक अपने समय और स्थान की सीमा को पार कर गया है और हम स्वयं को उसी जाति के लोगों के बीच का पाते हैं । क्योंकि इन लेखकों की रचनाओं में हम एक मनुष्य के रूप में हिस्सा बँटाते हैं जो पूरे विभेदों के बीच में भी हमें विलग होने से रोके रखता है । साहित्य के अतिरिक्त दूसरी ऐसी कोई अच्छी चीज नहीं है जो ईर्ष्या, जातीयता, धार्मिक और राजनीतिक कट्टरपना से हमारी रक्षा कर सके, और एक खास राष्ट्रवाद से हमें बचा सके । यह सत्य महान साहित्य में ही दिखायी पड़ता है कि सम्पूर्ण राष्ट्रों और सभी स्थानों के नर-नारी वास्तविक रूप से एक समान हैं । केवल अन्याय ही उनमें विभेद, वर्गीकरण और विखण्डन का बीज बोता है ।

राष्ट्रीय या जातिगत या सांस्कृतिक विभेदों के बीच भी अपनी मानवता की विरासत की सम्पन्नता को साहित्य के अतिरिक्त अच्छी तरह से और कौन सिखा सकता है,और साहित्य के अतिरिक्त कौन बता सकता है  कि वे विभिन्नताएं मानवता की बहुवर्णी रचनात्मकता का प्रकटीकरण ही हैं । वास्तव में अच्छा साहित्य पढ़ना एक आनन्द की अनुभूति की बात है, लेकिन यह उस सीख की भी अनुभूति है कि हम अपनी एकता और अपूर्णता में, अपने कर्मों, अपने स्वप्नों और अपनी प्रतिछाया में, अकेले या औरों के साथ रहकर, जनसामान्य के बीच की छवि और एकांत में चेतना के अवकाश की स्थिति में क्या हैं और कैसे हैं ।

जैसा ईसा बर्लिन (Isaiah Berlin) कहा करता था कि इन विरोधाभासी सत्यों का सम्पूर्ण योग ही मनुष्य की परिस्थितियों के सार तत्व का निर्माण करता है । आज के संसार में यह जीवन्त और सम्पूर्ण मानवता का ज्ञान केवल साहित्य में ही पाया जा सकता है । मानविकी की और किसी भी शाखा में चाहे दर्शन, इतिहास या कला हो ऐसा कहीं नहीं पाया जाता, और निश्चित रूप से सामाजिक विज्ञान भी एकता का सूत्र सँजोने में सफल नहीं हुए हैं, यह वैश्विक संवाद बनाने में सफल नहीं हुए हैं । इन मानविकी शाखाओं को भी ज्ञान के वर्गीकरण, उपवर्गीकरण का कैंसर लग गया है । ये अपने को भी किसी खंड या तकनीकी क्षेत्र में समेटने में लग गए हैं जहाँ के विचार और शब्द सामान्य नर-नारी की पहुँच के परे है । कुछ आलोचक या सिद्धान्तवादी साहित्य को भी विज्ञान में बदल देना चाहेंगे, लेकिन ऐसा कभी नहीं होगा, क्योंकि उपन्यास केवल एक क्षेत्र या अनुभव को खोजने के लिए नहीं होता । यह कल्पना के द्वारा मनुष्य जीवन की सम्पूर्णता को समृद्ध बनाने के लिए होता है जिसको लोगों से अलग नहीं किया जा सकता, विखंडित नहीं किया जा सकता और न तो ऐसे विशिष्ट आकार-प्रकार को सूत्रबद्ध कर सकता है जो किसी से अज्ञात रह जाँय । यह प्राउस्ट (Proust) के निरीक्षण का अर्थ ही है कि “वास्तविक जीवन, अंततः विचारशील और अभिव्यक्त जीवन, पूरी तरह से जिया गया एकमात्र जीवन यदि कोई है तो वह साहित्य है ।” वह अतिशयोक्ति नहीं कर रहा था और न तो अपने निजी व्यवसाय के प्रति अपना स्नेह अभिव्यक्त कर रहा था । वह तो उस खास सिद्धान्त को आगे बढ़ा रहा था कि साहित्य के फलस्वरूप ही जीवन को अच्छी तरह से समझा और जीया जा सकता है, और पूरी तरह से जीया गया जीवन दूसरों के जीने और दूसरों के साथ जीने और उनमें सहभागी होने की आवश्यकता की पूर्ति करता है ।
क्रमशः….

पूरे लेख को निम्न कड़ियों से क्रमशः पढ़ा जा सकता है –

  1. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-1
  2. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-2
  3. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-3
  4. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-4
  5. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-5
  6. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-6
  7. पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-7