पिछली प्रविष्टियों राजा हरिश्चन्द्र- एक, दो, तीन, चार और पाँच से आगे…..
इस ब्लॉग पर करुणावतार बुद्ध नामक नाट्य-प्रविष्टियाँ मेरे प्रिय और प्रेरक चरित्रों के जीवन-कर्म आदि को आधार बनाकर लघु-नाटिकाएँ प्रस्तुत करने का प्रारंभिक प्रयास थीं । यद्यपि अभी भी अवसर बना तो बुद्ध के जीवन की अन्यान्य घटनाओं को समेटते हुए कुछ और प्रविष्टियाँ प्रस्तुत करने की इच्छा है । बुद्ध के साथ ही अन्य चरित्रों का सहज आकर्षण इन पर लिखी जाने वाली प्रविष्टियों  का हेतु बना और इन व्यक्तित्वों का चरित्र-उद्घाटन करतीं अनेकानेन नाट्य-प्रविष्टियाँ लिख दी गयीं । नाट्य-प्रस्तुतियों के इसी क्रम में अब प्रस्तुत है अनुकरणीय चरित्र ’राजा हरिश्चन्द्र’ पर लिखी प्रविष्टियाँ। सिमटती हुई श्रद्धा, पद-मर्दित विश्वास एवं क्षीण होते सत्याचरण वाले इस समाज के लिए सत्य हरिश्चन्द्र का चरित्र-अवगाहन प्रासंगिक भी है और आवश्यक भी। ऐसे चरित्र दिग्भ्रमित मानवता के उत्थान का साक्षी बनकर, शाश्वत मूल्यों की थाती लेकर हमारे सम्मुख उपस्थित होते हैं और पुकार उठते हैं-’असतो मां सद्गमय’”
विश्वामित्र: ओ दानी, ला दे मेरी दक्षिणा! महीना भर बीत गया। सायंकाल होने को है। यहाँ कैसा नाटक फैलाया है तुमने!
हरिश्चन्द्र: महाराज! आधी स्वीकार कीजिए। शेष स्वयं को बेचकर अभी चुकता कर देता हूँ।
विश्वामित्र: आधी क्यूँ? सीधे कह दे, नहीं देना है। यह भी ले जा। ऐरा गैरा समझ रखा है क्या?
राजा: प्रभु अभी दिन शेष है। स्त्री-पुत्र को बेचकर आधा धन पाया, वह आपको समर्पित है। शेष स्वयं को बेचकर तुरंत दे दे रहे हैं। क्रोध शान्त हो, विप्र देवता!
विश्वामित्र: देख रे क्षत्रिय! मैं वही विश्वामित्र हूँ जिसके तपोबल से विधाता की सृष्टि काँपती है। तुम्हें अभी ब्राह्मण का ऋणी होने के कारण शाप नहीं दिया, इतना शुभ जानो। यदि आज की सायंकालीन आरती की बेला तक मेरी पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ नहीं दिया तो शाप देकर तुम्हारे सिर को खण्ड-खण्ड कर दूँगा। अभी जाता हूँ, फिर आऊँगा।
राजा: (शैव्या से) हे देवि! व्रत धारिणी प्रिये, जा! उपाध्याय की सेवा मन लगाकर करना। गुरु पत्नी को गुरु समान आदर देना। शिष्यों को पुत्र भाव में देखना। स्वधर्म और शील की रक्षा करना।

“समय की गति निराली है, प्रकृति का ढंग अपना। किसी का सत्य निर्मम है, किसी का नर्म सपना। कहेगा कौन पिक गाए न चातक यों न रोए। विजन वन का सुमन हूँ, मैं सुरभि अपनी सँजोए..।”

जाना तो है ही वल्लभे, जा!

(रानी जाती है। शिष्य बालक को घसीट कर ले जाता है। अंतरिक्ष से हाय, हाय की ध्वनि गूँजती है।)

अवर्णनीय कष्ट है इस धर्मधुरीण को। कितना हृदयहीन है विश्वामित्र!

राजा: (हाथ जोड़्कर) अरे सेठ साहूकारों! मुझे कोई पाँच सौ स्वर्ण मुद्राओं में खरीदकर मुझ पर कृपा कर देता। ब्राह्मण देवता का ऋण चुकाना है। ब्राह्मण के लिए मेरी गुहार सुन लो। मुझे खरीद लो। भईया मुझे खरीद लो। ब्राह्मण देवता आते ही होंगे। मैं झोली फैलाकर भीख माँग रहा हूँ, बड़ी कृपा होगी। हे दानशीलों! इस दीन पर दया करो, दया करो। अपनी सदाशयता का परिचय दो। अरे, कोई भी नहीं सुन रहा है। विश्वेश्वर की नगरी में भी मैं अनाथ हो गया। हाय रे विधाता!
(धर्म का प्रवेश)

धर्म: यह मेरे लिए इतना कष्ट सह रहा है। इस सत्य व्रती की कातरता तो देखते नहीं बनती। अब मैं आगे चलता हूँ। सत्य-पथ की इस यात्रा का न तो इसे पता है न मुझे। अंत तो इस यात्रा का है ही नहीं।

(धर्म चाण्डाल का वेष धारण करता है)

चाण्डाल: हाँ भैया! कहाँ बिकवइया है। खरीदवइया आ गया।

राजा: आप कौन हैं दयावान?
Harishchandra_by_RRV

चाण्डाल: हम चंडाल, डोम के राजा। बसेरा मसान में है। नदी के दोनों तीर-यही इस डोम का डेरा है। यहीं मसान में सोता जागता हूँ। हर चिता को आग देता हूँ। हर मुर्दा से तन का कपड़ा माँगता हूँ, बिना आधा कफन दिए लाश नहीं जलती मेरे मसान पर। तो साफ-साफ सुनो, मसान पर रमना होगा, कफन खसौटी करना होगा। यदि मंजूर हो तो बताओ और यह रुपया ले गठियाओ!
राजा: (स्वयं से) बड़ा दारुण समय उपस्थित है। झुक जाओ मेरे सिर सत्य, धर्म की जिज्ञासा भरे प्रश्न के सामने! गिर जाओ हे ग्रन्थ, ज्ञान, विज्ञान, संस्कार, स्वभाव मेरे सिर पर के निरर्थक भार से तुम इस मिट्टी पर! हे प्रत्युत्तरहीन महाप्रश्न! जिसने तुम्हें उत्तीर्ण कर दिया, उस दिव्य धर्म की जय हो! (चाण्डाल से) हे दयालु पुरुष! यहाँ मैं हूँ, यह मैं हूँ। आपका क्रीतदास हुआ।
चाण्डाल: तो अब लोटा-सोंटा-पगरी-झोरी लेकर पयान करो। दक्खिनी मसान अब तुम्हारी जिम्मेदारी पर।
(राजा सिर झुकाकर स्वीकार कर रहा है। इसी बीच विश्वामित्र का आगमन।)
विश्वामित्र: क्यों रे! ला, दे मेरी दक्षिणा। नसों में संचरित  होने वाले आवेश का रुधिर-वेग अब तक रोके था। अब तेरे सर्वनाश का समय उपस्थित हो गया है। कालपुरुष को मैं अविराम उस दिशा में दौड़ते हुए देख रहा हूँ, जहाँ शान्ति तो होगी पर ऋषि-आश्रमों की नहीं श्मसान की।
राजा: ऋषिवर! पराक्रम उस पर शोभा देता है जो रण में हो, न कि उसपर जो शरण में हो। मैं आपके पाँव पकड़ता हूँ। आप क्रोध को शांत करें, ये रहीं पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ। अपनी दक्षिणा स्वीकार करें। अब मैं उऋण हुआ।
विश्वामित्र: (विश्वामित्र साश्चर्य मुद्रा ग्रहण करते हुए, स्वगत) इस परीक्षा में यह अभी तक स्वयं को संभाले रहा, लेकिन मैं भी विश्वामित्र हूँ, मजा चखा दूँगा। इसको अपने सत् पथ से गिराना ही होगा। मैंने देवराज इन्द्र के सामने चुनौती स्वीकार की है। (चले जाते हैं)
चाण्डाल: हर मुर्दे के पीछे घूम-घूम कर कपड़े ले लेना होगा, और सुबह शाम मटके से भर कर पानी भी घर में रखना होगा।
राजा: जो आज्ञा।
(चाण्डाल के साथ चल देता है। पर्दा गिरता है। नेपथ्य से स्वर लहरी सुनाई पड़ती है)

सबै दिन होत न एक समा्न।
एक दिन राजा हरिश्चन्द्र सम्पत मेरु समान।
एक दिन भरत डोम घर पानी, अम्बर हरत मसान।
सबै दिन होत न एक समान॥

अगली प्रविष्टियों में जारी….