समय को रोका नहीं जा सकता। जो है उसका आनन्द से उपयोग करो। बादल को बाँध कर खेती नहीं होती। किस अनुकूल की प्रतीक्षा कर रहे हो। जो मिला वह खूब मिला है। अब नहीं तो कब? इसलिए किसी भी काल-विशेष के लिए कोई चीज निर्धारित न करो। जो ’उसने’ दिया वह प्रसाद छक कर खाओ। हर समय तुम्हारा है। ज़िन्दगी का ज़वाब ज़िन्दगी से दो। किसी का मुँह मत जोड़ो। किसी के साथ या संगठन का मुखापेक्षी न बनो। है, वह है। होगा, उसकी चिन्ता नहीं। अस्ति ही पर्याप्त है। भविष्यति अभी अजन्मा है, उसकी कौन फिक्र करे। इसलिए बचा है वही रचा है, अन्यथा सब क्षयमाण है। फिर दाँत निपोरना पड़ेगा। सब कुछ उपयोगितावादी ही नहीं, आनन्दवादी भी ज़िन्दगी का एक अध्याय है। इस पन्ने को आद्यन्त पढ़ो। पोथी बेठन में बाँधकर रखोगे तो तेरे न होने पर कोई तेरे होने की यादगारी न रखेगा। गाओ, गीतों से ही ज़िन्दगी का स्वागत होगा। उपलब्ध आनन्द की जय हो, जय हो।

भोजपुरी की यह कविता रस-रस यही तो ध्वनित करती है। देशज लिखाई में असली बात। विहँस-विहँस पढ़िए, मजा तो पीने में आएगा…सिवान का विस्तार, गोइंठा की चमक और लेंहड़ा भर मगज में भरने वाली बातें- खूब खूब आनन्द।

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हम तोंहसे कुल बतिया कहली सौ बार इहै मंठा महली
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा? 

समसै सिवान में खेत खेत के जोड़ रहल बा लगल डगर 
जइसे छरहरी पतुरिया के करिया कपार पर माँग सुघर
भईया एक्कै रहिया पर तूँ चोरवा अगोर के का करबा –
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥१॥

आपन तोहार केहू नइखै, भइयै नटई दबोच डलिहैं 
तोहरै मेहरी बेटवा कपार कै, एक-एक बार नोंच घलिहैं 
माटी ऊसर भइले पर ढेला फोर फोर के का करबा – 
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥२॥

तोहूँ चाभा राबड़ी खीर, ई मउज उड़ावत बा दुनिया 
का हाय-हाय कइले बाड़ा, मरदो बनला धोबी-धुनिया
कान्हीं पर लादल ना जाई, धन जोर-जोर के का करबा-
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥३॥

अपनै में कुकुरन के पिल्लन-अस बे-मतलब गुर्राला का
जोगी हो जा या भोग करा, बिच्चै में फँस चिल्लाला का 
पियहीं वाला चल जइहैं तब रस घोर घोर के का करबा –
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥४॥

आखिर एक दिन लटकानी में छाती पर चढ़ जाई मेहरी
तूँ छान फूँक के बना मस्त, फूटै सरवा कुण्डा-डेहरी
मस्ती के चल गइलै पर छाती झोर-झोर के का करबा –

कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥५॥

कर्हिआईं पर खांची दबलै गोइंठा बिनले से का होई
जियलै भर बा आछो-आछो मुअले पर तोहरे के रोई
दुलहिन के मुअले पर पगलू, तूँ गाँठ जोर के का करबा –
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥६॥

आवा धुरकंडल देंह, धूर में एक पकड़ फिर बाजीं जा 
आनन्द तबै जब साली हँस के पूछ उठै “ई का जीजा?”    
सूखल रोटी में आपन दाढ़ी बोर-बोर के का करबा –
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥७॥

जै दिन ई जिनगी रही, बिपत तोहरे संगे रहबै करिहैं 
तूँ केतनों हमके गारी दा, पंकिल अइसे कहबै करिहैं 
आवा हमरे संगे गावा, लेंहड़ा बटोर के का करबा – 
कुल गुर गोंइठा भइले पर तूँ दाँतै निपोर के का करबा ॥८॥

—प्रेम नारायण पाण्डेय ’पंकिल’ 

मंठा महली-(मुहावरा) बार-बार दोहराना। गुर गोंइठा होना-(मुहावरा) सब कुछ बिगड़ जाना। दाँत निपोरना-पछताना। समसै– सम्पूर्ण। करिया कपार– काले सिर पर। नटई-गला। कुकुरन के पिल्लन-अस– कुत्ते के बच्चों की तरह। मेहरी-मेहरारू, पत्नी। सरवा- साला(एक गाली)। कर्हिआईं-कमर। गोइंठा-उपला। आछो-आछो– मुँहदिखाई, प्रशंसा। धुरकंडल देंह-धूल धूसरित शरीर। गारी-गाली। लेंहड़ा बटोरना-भीड़ जुटाना।