Poetry, Ramyantar

एक स्त्री के प्रति

स्वीकार कर लिया काँटों के पथ को पहचाना फ़िर भी जकड़ लिया बहुरूपी झूठे सच को कुछ बतलाओ, न रखो अधर में हे स्नेह बिन्दु! क्यों करते हो समझौता? जब पूछ रहा होता हूँ, कह देते हो ‘जो हुआ सही…

Poetry, Ramyantar

मधु की तरह घुलता जा रहा हूँ मैं

नये वर्ष के आगमन पर बहुत कुछ संजोया है मन में। सम्भव है नए साज बनें हृदय के अनगिन स्नेहिल तार जुडें मन का रंजन हो उल्लसित हर अकिंचन हो स्वप्न अवसित धरा पर मधुरिम यथार्थ का स्यंदन हो। विचारता…

Poetry, Ramyantar, Songs and Ghazals

स्नेहिल मिलन की सीख दे दो

फ़ैली हुई विश्वंजली में, प्रेम की बस भीख दे दो विरह बोझिल अंत को स्नेहिल मिलन की सीख दे दो। चिर बंधनों को छोड़ कर क्यों जा रही है अंशु अब अपनी विकट विरहाग्नि क्यों कहने लगा है हिमांशु अब…

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मैं डूबा नयन के नीर में..

आज की सुबह नए वर्ष के आने के ठीक पहले की सुबह है। मैं सोच रहा हूँ कि कल बहुत कुछ बदल जायेगा, कैलेंडर के पन्ने बदल जायेंगे, सबसे बढ़कर बदल जायेगी तारीख। मैं चाहता हूँ इस ठीक पहले की…

Poetry, Ramyantar, Songs and Ghazals

परिवर्तन आने वाला है

बज गयी दुन्दुभि, परिवर्तन आने वाला है। है निस्सीम अगाध अकल्पित, समय शून्य का यह विस्तार प्रिय देखो वह चपल विहंगम चला जा रहा पंख पसार ‘काल अमर है’ का संकीर्तन यही विहग गाने वाला है। वह देखो गिर रहे…

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युद्धस्व विगतज्वर

कल के अखबार पढ़े, आज के भी। पंक्तियाँ जो मन में कौंधती रहीं- “अब जंग टालने की कवायद शुरू”। “सीमा पर फौजों का जमावड़ा नहीं”। “गिलानी बोले-कोई भी नही चाहता जंग”। “पाकिस्तान को मिली संजीवनी।” “भारत की गैस पर पाक…

Poetry, Ramyantar, Songs and Ghazals

मैं, मैं अब नहीं रहा

मैं, मैं अब नहीं रहा, तुम ही तो हूँ। बहुत भटकता रहा खोजता अपने हृदय चिरंतन तुमको जो हर क्षण आछन्न रहे ओ साँसों के चिर बंधन तुमको, मैं जाग्रत अब नहीं रहा, गुम ही तो हूँ। मैं, मैं अब…

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हिन्दी ब्लॉग लेखन: साहित्य की सीमाओं से परे सर्जित साहित्य

हिन्दी ब्लॉग लेखन को साहित्य की स्वीकृत सीमाओं में बांधने की अनेक चेष्टाएँ हो रही हैं। अबूझे-से प्रश्न हैं, अबूझे-से उत्तर। ब्लॉग की अवधारणा साहित्या की अवधारणा से मेल नहीं खाती। सब कुछ अवांछित, असुंदर, अनगढ़ साहित्य की संपत्ति कैसे…

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क्यों न मेरा यह हृदय मूक-सा रहने दिया

क्यों न मेरा यह हृदय मूक-सा रहने दिया? क्या करुँ उस अग्नि का निशि-दिन जले जो इस हृदय में क्या करुँ उस व्यग्रता का जा छिपी जो उर-निलय में क्यों असीमित यह प्रणय बहु-रूप सा रहने दिया? तारकों की तूलिका…

Poetry, Ramyantar

कहाँ हो मेरे मन के स्वामी आओ

कहाँ हो मेरे मन के स्वामी आओ, मैं हूँ एक अकिंचन जग में प्रेम-सुधा बरसाओ। आज खड़ा है द्वार तुम्हारे तेरी करुणा का यह प्यासा दृष्टि फेर दो कुछ तो अपनी दे दो अपना स्नेह दिलासा हे मेरे जीवनधन मुझको,…