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Article | आलेख, General Articles

आज मैं एक बार फ़िर हँसा

आजकल मुझे हंसी बहुत आती है, सो आज मैं फ़िर हँसा। अब ‘ज्ञान जी’ की प्रविष्टियों का ‘स्मित हास’, ‘ताऊ’ की प्रविष्टियों का ‘विहसित हास’, आलोक पुराणिक की प्रविष्टियों का ‘अवहसित हास’ भी बार-बार मुझे मेरी हंसी की याद दिला…

Essays, General Articles, चिंतन

निर्लज्ज तीन बार हंसाता है। कैसे?

laughing sailor (Photo credit: atomicShed) साहित्य में शील हास्य का आलंबन माना जाता है । आतंकवाद की तत्कालीन घटना के बाद पता चला कि निर्लज्ज भी कैसे हास्य के आलंबन हो जाते हैं ? सुना तो गोपियों के लिए था…

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मेरे समय की पहचान या सफल होने के नुस्खे

मैंने अपने समय को पहचानने की कोशिश की। मुझे लगा समय समाज को अतिक्रमित नहीं करता- उसे व्यक्त करता है। मेरे अस्तित्व ने मेरे व्यक्तित्व को अनगिन मौकों पर इस समय और समाज से लड़ते देखा है। मैंने अपनी इस…

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Sushil Tripathi-सुशील त्रिपाठी व कैमूर की पहाड़ियाँ

सुशील त्रिपाठी को मैं उनकी लिखावट से जानता हूँ । एक बार बनारस में देखा था -पराड़कर भवन में । वह आदमी एक जैसा है- मेरी उन दिनों की स्मृति एवं इन दिनों की श्रद्धांजलि के चित्रों में। चुपचाप उनके…