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short poem

Ramyantar

अधूरी कविता …

एक पन्ना मिला । पन्ने पर फरवरी २००७ लिखा है, इसलिये लगभग तीन साल पहले की एक अधूरी कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ । अधूरी इसलिये कि उस क्षण-विशेष की संवेदना और भाव-स्थिति से अपने को जोड़ नहीं पा रहा…

Ramyantar

दिनों दिन सहेजता रहा बहुत कुछ …

(१)दिनों दिन सहेजता रहा बहुत कुछजो अपना था, अपना नहीं भी था,मुट्ठी बाँधे आश्वस्त होता रहाकि इस में सारा आसमान है;बाद में देखा,जिन्हें सहेजता रहा क्षण-क्षणउसका कुछ भी शेष नहीं,हाँ, जाने अनजाने बहुत कुछलुटा दिया था मुक्त हस्त-वह साराद्विगुणित होकर…

Ramyantar

तुम्हें कौन प्यार करता है ?

हे प्रेम-विग्रह !एक द्वन्द्व है अन्तर्मन में,दूर न करोगे ? मेरी चेतना के प्रस्थान-बिन्दु परआकर विराजो, स्नेहसिक्त !कि अनमनेपन से निकलकर मैं जान सकूँ कि तुम्हें प्यार कौन करता है ? क्या वह जो अपने प्राणों की वेदी परप्रतिष्ठित करता…

Ramyantar

मैं कैसे प्रेमाभिव्यक्ति की राह चलूँ .

तुम आयेविगत रात्रि के स्वप्नों में श्वांसों की मर्यादा के बंधन टूट गयेअन्तर में चांदनी उतर आयीजल उठी अवगुण्ठन में दीपक की लौविरह की निःश्वांस उच्छ्वास में बदल गयीप्रेम की पलकों की कोरों से झांक उठा सावनऔर तन के इन्द्रधनुषी…

Ramyantar

तुम्हें सोचता हूँ निरन्तर…

तुम्हें सोचता हूँ निरन्तर अचिन्त्य ही चिन्तन का भाव बन जाता हैठीक उसी तरह, जैसे, मूक की मोह से अंधी आँखों में आकृति लेते हैं अनुभूति के बोल,जैसे,किसी प्रेरणा की निःशब्द गति भर देती है सुगन्ध से मेरी अक्रिय संवेदन-दृष्टि…

Ramyantar

सही कहा तुमने…..

वर्ष अतीत होते रहेपर धीरज न चुकाऔर न ही बुझातुम्हारा स्नेह युक्त मंगल प्रदीप, महसूस करता हूँ-तुम समय का सीना चीर करयौवन के रंगीले चित्र निर्मित करोगे,एक कहानी लिखोगे, जिसमें होगास्नेह-स्वप्न-जीवन का इतिवृत्त,और प्रतीक्षा में डबडबायी मेरी आँखेंपोंछ दोगे अपने…

Ramyantar

चुईं सुधियाँ टप-टप

चुईं सुधियाँ टप-टपआँखें भर आयीं । कैसे अवगुण्ठन को खोलतुम्हें हास-बंध बाँधा थाकैसे मधु रस के दो बोलबोल सहज राग साधा था, हुई गलबहियाँ कँप-कँपसाँसे बढ़ आयीं । कैसे उन आँखों की फुदकनमहसूसी थी मन के आँगनकैसे मधु-अधरों का कंपनगूँज…

Love Letter, Ramyantar

अपने प्रेम-पत्र में यही तो लिखा मैंने….

“जीवन के रोयें रोयें कोमिलन के राग से कम्पित होने दो,विरह के अतिशय ज्वार कोठहरा दो कहीं अपने होठों पर,दिव्य प्रेम की अक्षुण्णता कोसमो लो अपने हृदय में, औरअपने इस उद्दाम यौवन की देहरी परप्रतीक्षा का पंछी उतरने दो;फिर देखो-मैं…

Ramyantar

अथ-इति

निवृत्ति की चाह रहीअथ से भीइति से भी । अथ पर ही अटका मनइति को तो भूल गयागति भी अनजान हुई ।