सच्चा शरणम्
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सर्वत्र तुम

Photo: Devian Art(Gigicerisier)

मैंने चंद्र को देखा
उसकी समस्त किरणों में
तुम ही दिखाई पड़े
मैंने नदी को देखा
उसकी धारा में तुम्हारी ही छवि
प्रवाहित हो रही थी
मैंने फूल देखा
फूल की हर पंखुड़ी पर
तुम्हारा ही चेहरा नजर आया
मैंने वृक्ष देखा
उसकी छाया में मुझे
तुम्हारी प्रेम-छाया दिखाई पड़ी
फ़िर मैं आकाश की ओर देखने लगा
उसके विस्तार ने खूब विस्तृत अर्थों वाली
तुम्हारी मुस्कान की याद दिला दी
और तब मैंने धरती को देखा
उसके प्रत्येक अवयव में तुम ही
अपनी सम्पूर्ण प्रज्ञा के साथ अवस्थित थे,

मैं सम्मोहित था
मैं स्वयं को देखा
मेरी बुद्धि, आत्मा, हृदय- सब कुछ
तुम्हारे ही प्रकाश से प्रकाशित था,

वस्तुतः वाह्य में भी तुम हो,
अन्तर में भी तुम-
सर्वत्र तुम।

7 comments

  1. यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे -अच्छी रचना /अर्चना -तत् त्वं असि !

  2. जहाँ देखूँ वहाँ है तू .

    तुझे अपना बनाया है .

    तुने दिल मेरा चुराया है !

  3. bahut khoob , sunder abhivyakti., meri rachna,”main” aur “too hi too” bhi padhen, swagat hai. dhanyawad. swapn

  4. “उसके विस्तार ने खूब विस्तृत अर्थों वाली
    तुम्हारी मुस्कान की याद दिला दी
    और तब मैंने धरती को देखा
    उसके प्रत्येक अवयव में तुम ही
    अपनी सम्पूर्ण प्रज्ञा के साथ अवस्थित थे”
    गूढ़तम सरलताओं की हल्की उठान !
    अद्भुत!

  5. बहुत सुंदर!
    ईशावास्यमिदं सर्वं, यत्किंच जगत्यान्जागत…

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