सच्चा शरणम्
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क्या दूर सुहृद ! प्रियतम ! निराश चित्कार रहा अम्बर-अन्तर (गीतांजलि का भावानुवाद )

Rabindranath Tagore Art thou abroad on this stormy night
on the journey of love, my friend ?
The sky groans like one in despair.

I have no sleep to-night. Ever and again I open
my door and look out  on the darkness, my friend ?

I can see nothing before me. I wonder where lies
thy path !

By what dim shore of the ink-black river, by
what far edge of the frowning forest,
through what mazy depth of gloom art
thou threading thy course to come to me,
my friend ?      

(Geetanjali : R.N. Tagore)

इस झंझावाती रजनी में स्नेहाविल यात्रा के सहचर
क्या दूर सुहृद ! प्रियतम ! निराश चित्कार रहा अम्बर-अन्तर ।

निद्रा विरहित पट खोल सुहृद मैं तिमिर बीच झाँकता रहा
विस्मित विस्फारित नयन खोल खोजता तुम्हारा पंथ कहाँ
कुछ भी न सूझ पड़ता आगे हो कहाँ तिमिर में मित्र प्रवर –
क्या दूर सुहृद ! प्रियतम ! निराश चित्कार रहा अम्बर-अन्तर ।

मसि तममय किस सरि के तट पर किस उद्वेलित वन कोने में
किस गहन धुंध में तुम विलीन हो गये स्वयं को खोने में
क्या मुझ तक आने का ताना बाना बुनते हो पंकिल कर –
क्या दूर सुहृद ! प्रियतम ! निराश चित्कार रहा अम्बर-अन्तर ।

(’पंकिल’- मेरे बाबूजी )

14 comments

  1. िस सुन्दर अनुवाद के लिये बधाई और धन्यवाद्

  2. बहुत सुन्दर अनुवाद किया है,

    आपके बाबू जी को नमस्कार पहुँचे !

  3. पिता जी को उनके भावानुवाद के लिए….
    उतनी उत्कृष्ठ शब्दावली तो नहीं …
    एक अदना सा बालक ..
    क्या कह सकता है भला..
    सिवाय सादर चरण स्पर्श के ।
    आभार !

  4. बहुत सुंदर अनुवाद, सादर प्रणाम.

    रामराम.

  5. आपका तो जबाव नही ……………..बहुत ही सुन्दर रचना पडवायी एक सुन्दर अनुवाद भी पढने को मिला…….आपके ब्लोग पर आकर बहुत कुछ सिखने को मिलता है …….अतिसुन्दर

  6. हिमांशु भाई नमस्कार!
    अच्छा लगा आपके पिताजी का ये लेखनी .
    बधाई .

  7. बाबूजी ने पूरी तरह डूबकर भावानुवाद किया है.. उनकी रचनाएं सीधे दिल को छू जाती हैं .. हैपी ब्लॉगिंग

  8. बाबूजी ने पूरी तरह डूबकर भावानुवाद किया है.. उनके भावानुवाद सीधे दिल को छू जाते हैं .. हैपी ब्लॉगिंग

  9. निराश चित्कार रहा अम्बर-अन्तर ।
    गुरुदेव की कविता में रचे बसे भावो और उनके अंतर की निराश चीत्कार का सुन्दर प्रस्तुतीकरण के लिए पंकिलजी का बहुत आभार ..!!

  10. मसि तममय किस सरि के तट पर किस उद्वेलित वन कोने में
    किस गहन धुंध में तुम विलीन हो गये स्वयं को खोने में …

    aapke pitaji ne mujhe bahut prabhavit kiya.

    himanshu ji unki utkrisht lekhni ka kayal hoon…

    aur haan aapki 'samalochna' (dhyaan dein SAMALOCHNA) ka bhi….
    pasand aaie to aap bebak kehte hain pasand aaiye nahi to with reason khot nikalte hain….

    ….aapke comments ka sadev aabhari rahoonga.

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