पहली एवं दूसरी कड़ी से आगे…

A play based on the story of Nal and Damayanti
नल: (उसकी बाहें पकड़कर सम्हालते हुए तथा आँसू पोंछते हुए) सुकुमारी! रोना अशुभ है, अतः मत रोओ। यदि मेरे अपराध के कारण तुम रो रही हो तो उस अपराध के लिए राजा नल हाथ जोड़कर क्षमा माँगता है। निष्कारण क्रोध न करो, प्रिये! क्रोध को छोड़ो। मेरे ऊपर प्रसन्न हो जाओ। चाहे परिणाम जो हो, नल देवताओं के प्रतिशोध को झेल लेगा। तुम अधरों को मधुर हास्य से सुशोभित करो। नेत्रों को अपनी विलास लीला से चंचल करो। दृग बिन्दु की वर्षा समाप्त करो। प्रसन्नमुखी हो जाओ। मेरे सिंहासन को अलंकृत करो। मेरे अंक का विशिष्ट अलंकार बनो। तुम मेरी पीर का पराभव करो। वचन से अनुकंपा करो, अन्यथा मैं अब जी नहीं सकता। 

यह प्रस्तुति

नल दमयंती की यह कहानी अद्भुत है। भारत वर्ष के अनोखे अतीत की पिटारी खोलने पर अमूल्य रत्नों की विशाल राशि विस्मित करती है। इस पिटारी में यह कथा-संयोग ऐसा ही राग का एक अनमोल चमकता मोती है। भाव-विभाव और संचारी भाव ऐसे नाच उठे हैं कि अद्भुत रस की निष्पत्ति हो गयी है। निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। नल दमयंती की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है। दृश्य-परिवर्तन के क्रम में कुछ घटनायें तीव्रता से घटित होती दिखेंगी। इसका कारण नाट्य के अत्यधिक विस्तृत  हो जाने का भय है, और शायद मेरी लेखनी की सीमा भी। प्रस्तुत है पहलीदूसरी के बाद तीसरी कड़ी।
दमयंती: हे प्राणनाथ!  मैं सब देवताओं को प्रणाम करके आप को ही पतिरूप में वरण कर रही हूँ। यह मैं सत्य-सत्य शपथ खा रही हूँ।
नल: प्रिये! ज्यों ही पहली बार पाया तुम्हारी मुख छवि का दर्शन तो देखते ही निमिष मात्र में अन्तरतम्‌ के चिन्मय वातायन खुल गए। मेरे रोम रोम में आत्मरमण का आलोड़न जागा। मैं तन,मन, प्राण, आत्मा के सारे ही धरातलों पर समूचा ही तुमको पा गया। निहाल हो गए मेरे प्राण! देवताओं के वरण का तुमसे अनुरोध करने चला आया। तुम्हें नल ने घोर कष्ट दिया। किन्तु मैं धर्म विरुद्ध  अपना स्वार्थ कैसे साधूँ, कमल नयने!

दमयंती: (नल का मुख अपनी मृणाल कोमल अंगुलियों से ऊपर उठाती हुई गद्गद स्वर में) समझ रही हूँ प्राण! आप की अमोघ धर्मनिष्ठा को कौन नहीं जानता। नरेश्वर! इसके लिए एक निर्दोष उपाय है। इसके अनुसार काम करने से आपको को कोई दोष नहीं लगेगा। उपाय है कि आप लोकपालों के साथ स्वयंवर में मण्डप में आयें। मैं उनके सामने ही आपको वरण कर लूँगी। मेरा विनय अस्वीकार न करें जीवन-धन! 
नल: (दमयंती का सिर सहलाते हुए स्नेहमयी वाणी में)मुझे यशस्वी एवं कृतकार्य बनाने वाली गुणमयी राजकन्ये! तुम्हारी विनयशीलता एवं हृदय की पवित्रता के लिए कोई शब्द नहीं है मेरे पास। विधाता तुम्हें सफल मनोरथा करे। कल स्वयंवर में मुझे सनाथ करना।
(नल का प्रस्थान। पर्दा गिरता है।)

चतुर्थ दृश्य 
(देवता बाहर प्रतीक्षा कर रहे हैं। नल उन्हें प्रणाम करते हुए कहते हैं-)

नल: हे देवगण! मैं आपलोगों की आज्ञा से दमयंती के महल में गया। बाहर अनेकों द्वारपाल पहरा दे रहे थे, परंतु उन्होंने आप लोगों के प्रभाव से मुझे देखा नहीं। केवल दमयन्ती और उसकी सखियों ने मुझे देखा। मैंने दमयंती से आप लोगों के गुण और प्रभाव का विशद वर्णन किया। कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, परंतु वह तो आप लोगों को न चाह कर मुझे ही वरण करने पर तुली हुई है। देववरों! वस्तुस्थिति तो यह है कि किसी भी सद्गुण का एक कण भी मुझमें नहीं है और सम्पूर्ण दोषों की जीवंत प्रतिमा हूँ मैं। पर बलिहारी है उसके अनुराग भरे नयनों की- उसके समर्पणपूर्ण उरस्थल की, कि वह केवल, केवल मुझ पर ही न्यौछावर हो गयी थी और उसे मेरे अतिरिक्त अन्य सबकी विस्मृति हो गयी थी। एक बार नहीं शत-सहस्र बार लज्जा में मेरे प्राण जैसे भूमि में समा जाते थे। पर वह समर्पिता मुझे ही अपना जीवन-सर्वस्व मान चुकी थी। उस लावण्यमयी की विभोरावस्था अवर्णनीय है सुरवरों! जल से पूरित  उसके उन नयन सरोजों को मैं भूल नहीं पाता। मैं उस भावमयी के भावों की आँधीं में ऐसा बह गया कि आपलोगों के पास पुनरावर्तित होने में इतना विलम्ब हो गया। उसके ताम्बूलरंजित अधर अभी कम्पित ही थे कि मैं किसी भाँति उसके प्राण रमण की संबोधनमयी वाणी को विस्तृत करता हुआ बाहर आप तक आ गया हूँ।

देवगण: अब तुमसे क्या पूछना और क्या कहना! जब तुम्हारे साथ स्वयंवर में बैठना है, तो कल जो होगा, देखा जायेगा। बाकी बातें व्यर्थ ही हैं। (देवता अदृश्य हो जाते हैं।) 
 (पर्दा गिरता है।) 

क्रमशः—