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मैं चिट्ठाकार हूँ पर.. गिरिजेश राव जैसा तो नहीं

मैं चिट्ठाकार हूँ, पर गिरिजेश राव जैसा तो नहीं जो बने तो निपट आलसी पर रचे तो जीवन-स्फूर्ति का अनोखा  व्याकरण- बाउ। संस्कारशील गिरिजेश राव कहूँ?- शृंखलासापेक्ष, पर्याप्त अर्थसबल, नितान्त आकस्मिकता में भी पर्याप्त नियंत्रित। जो प्रकृति का शृंगार है-…

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प्राणों के रस से सींचा पात्र : बाउ (समापन किस्त)

एक आलसी का चिट्ठा– गिरिजेश भईया का चिट्ठा, स्वनाम कृतघ्न आलसी का चिट्ठा। यहाँ पहुँचते ही होंगे अवाक! टिप्पणी को विचारेंगे, होंगे किंकर्तव्यविमूढ़। अगिया बैताली और स्थितप्रज्ञ- दोनों एक साथ। बिलकुल बाउ की तरह। बाउ, माने भईया का बनाया एक…

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प्राणों के रस से सींचा पात्र :बाउ (गिरिजेश भईया की लंठ महाचर्चा)

एक आलसी का चिट्ठा– गिरिजेश भईया का चिट्ठा, स्वनाम कृतघ्न आलसी का चिट्ठा। यहाँ पहुँचते ही होंगे अवाक! टिप्पणी को विचारेंगे, होंगे किंकर्तव्यविमूढ़। अगिया बैताली और स्थितप्रज्ञ- दोनों एक साथ। बिलकुल बाउ की तरह। बाउ, माने भईया का बनाया एक…

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मैं चिट्ठाकार हूँ, पर…

मैं चिट्ठाकार हूँ, पर अनूप शुक्ल जैसा तो नहीं , जिनकी लेखनी उनके प्राचुर्य का प्रकाश है । यह प्राचुर्य का प्रभाव ही है न, जिससे मानव अपने को अभिव्यक्त करता है । वह अपने को बहुतों में, क्षुद्र को…

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क्या ब्लॉग साहित्य है ? – मेरी हाजिरी

बिजली आ गयी । हफ्ते भर बाद । ’बूड़े थे पर ऊबरे’ । बिजली की अनुपस्थिति कुछ आत्मबोध करा देती है । रमणियों की तरह इसकी एक झलक पाने की उत्कंठा रहने लगी है मन में । आज ही, अभी…

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टिप्पणी अदृश्य होकर करते हैं हम …

आशीष जी की यह पोस्ट पढ़कर टिप्पणी नियंत्रण का हरबा-हथियार (मॉडरेशन) हमने भी लगाया ही था कि पहली टिप्पणी अज्ञात साहब की ही आ गयी । रोचक है, और उपयोगी भी । कितना सच्चा अर्थ पकड़ा है उन्होंने मेरी कविता…

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ये हुई न टिप्पणी !

टिप्पणीकारी को लेकर काफी बातें करते रहने की जरूरत हमेशा महसूस होती है मुझे । मैं इस चिट्ठाजगत में टिप्पणीकारी के अर्थपूर्ण स्वरूप को लेकर विमर्श करते रहने का हिमायती हूँ । पर आज अपनी इस प्रविष्टि में मैं किसी…

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ब्लॉगवाणी पर अभी कुछ कार्य, सुधार शेष है

ब्लॉगवाणी का चिट्ठा संकलकों में एक प्रतिष्ठित स्थान है । ज्यादातर चिट्ठों के अनेकों पाठक इस संकलक के माध्यम से ही पहुँचते हैं । मेरे आँकड़ों में भी ज्यादातर पाठक इस संकलक से ही आते हैं । हर चिट्ठे की…

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चिट्ठाकार-चर्चा, चिट्ठा-चर्चा और चिट्ठा-चर्चा

आपने पढ़ी होगी। अगर नहीं पढ़ी, तो यह रही अरविन्द जी की चिट्ठाकार-चर्चा, इस चर्चा के एक कूट शब्द को अनावृत करती रचना जी की यह टिप्पणी और इस टिप्पणी पर थोड़ी और खुलती यह चिट्ठा-चर्चा। नहीं मालूम, अरविन्द जी…

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रीमा जी की ’बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम’ और अरविन्द जी की टिप्पणी: कुछ मैं भी कहूँ

सबसे पहले स्पष्ट करूँ कि इस आलेख की प्रेरणा और प्रोत्साहन अरविन्द जी की टिप्पणी है, जो उन्होंने रीमा जी की प्रविष्टि पर की है। रीमा जी ने ’बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम’ मुहावरे को वृद्ध-परिहास का मुहावरा मान लिया है।…