मैं चिट्ठाकार हूँ, पर गिरिजेश राव जैसा तो नहीं जो बने तो निपट आलसी पर रचे तो जीवन-स्फूर्ति का अनोखा  व्याकरण- बाउ। संस्कारशील गिरिजेश राव कहूँ?- शृंखलासापेक्ष, पर्याप्त अर्थसबल, नितान्त आकस्मिकता में भी पर्याप्त नियंत्रित। जो प्रकृति का शृंगार है- चाहे वह शोभन हो, मधुर हो, सुन्दर व शान्त हो अथवा भयानक व निष्ठुर हो- एक अनोखे व मूक प्राण प्रवाह से कोई शील निर्मित करता है और एक संस्कारशील सनातन कालयात्री सम्मुख हो जाता है।

गिरिजेश राव माने स्मृति में शाश्वत व्यक्तित्व ढूँढ़ता लठियारा। विनम्रता के साथ निर्भीकता का योग। गुंडई के साथ उदारता और गंभीरता में तनिक लंठई, माधुर्य। यह परम्परा का शील है, संस्कारों से प्राणवान्। शिव और अशिव, बूझ-अबूझ, तथ्य-मिथ्या की परवाह न करिए, गिरिजेश राव में धारणाओं की हार्दिक अनुभूति और प्रभाव का सौन्दर्य निरखिए। 

सनातन कालयात्री और चिरपरिचित आलसी संज्ञाभिहित! विचित्र दुविधा है। दोनों एक साथ? एक प्राण शक्ति है विकास की आकुलता एवं गति की अदम्यता से शाश्वत अंतःसंयुक्त और वह सदैव रहती है उर्ध्व-अग्रसर, आगे-आगे चलती हुई। इसी प्राणशक्ति के पुद्गलपुंज विश्राम के शाश्वत लोभ से भी विपरीततः आक्रान्त हैं। बात वही कि बार-बार भीतर-भीतर चलने की अदम्य प्रेरणा प्राप्त करना और पुनः पुनः अनुद्वेलित होकर जहाँ हैं वहीं पड़े रहने की विश्रामकामना भी पालते रहना। यह मूलतः तल्लीन नहीं, बल्कि विलीन होने की इच्छा है। इसी इच्छा को अति से बचाने के लिए सनातन गिरिजेश सत्वर लिखते हैं ब्लॉग और नाम देते हैं ’एक आलसी का चिट्ठा’।

मैं चिट्ठाकार हूँ, पर.. एक विशिष्ट श्रृंखला के रूप में ब्लॉगिंग के शुरुआती दिनों में लिखना चाहा था। ब्लॉगिंग के महारथी व्यक्तित्वों पर लघु टिप्पणी का प्रयास था यह। एक ही प्रविष्टि आ सकी। बाद में कुछ आशंकायें कि इनके व्यक्तित्व से आक्रांत न हो जाऊँ मैं और कुछ निश्चिंतता कि कभी भी लिख लूँगा इन्हें सुविधानुसार- यह प्रविष्टियाँ छूटी पड़ी रही। ड्राफ्ट में पड़ा शीर्षक उलाहना देता था, पर बहाना न मिल पाता था। गिरिजेश भईया की फेसबुकिया आँख-मिचौनी (कभी अति सक्रिय, कभी गुम) ने तनिक बल दिया और यह दूसरी प्रविष्टि अपना स्वरूप ले पायी। अब शायद इस शृंखला को लिखने की अपनी यह अभीप्सा पूरी करूँ। और नाम भी तो जुड़ गए हैं सूची में।

चित्र: सत्यार्थमित्र से साभार।