नीचे की कविता, कविता नहीं, कहानी है। नीतू दीदी की कहानी कह रहा हूँ मैं। मेरे कस्बे के इकलौते राष्ट्रीयकृत बैंक में कैशियर होकर आयी थीं और पास के ही घर में किराए पर रहने लगीं थीं। सहज आत्मीयता का परिचय बना-कब गूढ़ हुआ- मैंने नहीं जाना। कुल छः महीने रहीं नीतू दीदी। ट्रांसफर हो गया उनका। पर इन छः महीनों में नीतू दीदी के भीतर का अनंत गह्वर मैंने पहचाना। उस चुलबुली चिड़िया के अन्तर में चिपकी हुई बेचैनी मैंने महसूसी। एक दिन बाँध ढहा, सब कुछ बह निकला- बातों ही बातों में। अब मैं जान गया था, नीतू दीदी ने तब तक शादी क्यों नहीं की थी? वह कभीं भी शादी क्यों नहीं करेंगी? जो उन्होंने मुझसे कहा, ज्यों का त्यों यहाँ-

A capture from Diary
A capture of Diary-pages

यह खेल नियति का देखो, कितना विपुल कष्टदायी है
विकल हुआ है हृदय, आज प्राणों पर बन आयी है
जो सौभाग्य पुष्प था अपना वही हृदय का शूल हुआ है
जो उर में उल्लास रूप था वह कष्टों का मूल हुआ है
तरु की छाया समझ रही थी, वह तो दुःख की कठिन धूप है
जो उल्लास समझ बैठी थी, वह तो केवल विजन रूप है
इस संसार सकल में इतना, कहाँ कहाँ कैसा संशय है
सरल रूप में हुआ दृष्टिगत, पर देखो कितना विस्मय है?

खूब घिरे थे बादल, लेकिन बिन बरसे ही चले गए
हम भी कैसी तृप्ति आस से विस्मित होकर छले गए
आज दूर निज से होकर बेचैन हुआ जाता है मन
प्रेम वारि से विलग कहाँ होकर रह पाता है जीवन?

जिन्हें हृदय का अधिपति समझा, उनसे क्या यह प्रत्याशा थी?
क्या मुझको समझाने लायक, केवल एक यही भाषा थी?
क्या क्षणभर में ही खो बैठे, अपनी दृढ़ता, अपना चिंतन?
क्या भूल गए जो कभी दिया था मुझको वह अनमोल वचन-
“जग छूट जाय परिवार सही, पर हम न विलग हो पायेंगे
अपनी नीरवता में ही हम आनंद सुधा बरसाएंगे”
क्या यह छल था? किया बात से तुमने जी भर कर सम्मोहित
मैं विरहित मोहित हो बैठी आज कंटकों से हूँ लोहित।

यह सत्य, विरह में प्रेम हृदय में संचित होकर रह पाता है
यह सत्य, मिलन में प्रेम ‘प्रेम’ की आंखों से बह-बह जाता है
पर मिलन कहाँ, है विरह कहाँ, यह तो है मुझ पर अनाचार
क्या किया नहीं कुछ भी विचार, मैं आज पडी हूँ निराधार!

उस दिन की याद करो क्षण भर, जब रूप-राशि विस्मित थे हम
आलोक-बिन्दु हिय में संचित था, कण-कण में सुरभित थे हम
गूंजा करता था सजल गान, यह प्रकृति मधुर मुस्काती थी
तुम खो जाते थे शून्य बीच, मैं भी अनंत खो जाती थी
उन प्राणों का कहना क्या था, नर्तन करता आनंद वहाँ
सोचो! जब प्रमुदित हो मानस, स्वीकार तब वह बंध कहाँ?
कैसी अनूप थी, साग्रह थी, अपनी यह प्रेम-पिपासा भी
हो उत्सर्ग प्राण तेरे हित मन की यह अभिलाषा थी
पर हाय! हमारी रूचि कितनी शुचिहीन प्रतिष्ठित होकर आयी
तेरी छवि भी हृदय-मध्य की प्रेम-प्रतिष्ठा खोकर आयी।

क्रमशः