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March 2009

Article, Contemplation, Ramyantar, Stories, आलेख, चिंतन

सबका पेट भरे

एक महात्मा हैं, उनके पास जाता रहता हूँ। महात्मा से मेरा मतलब उस गैरिकवस्त्र-धारी महात्मा से नहीं, जिनके भ्रम में इस पूरी दुनियाँ का निश्छल मन छला जाता है। महात्मा से मेरा अर्थ महनीय आत्मा से है। बात-बात में उन्होंने…

Capsule Poetry, Poetry, Ramyantar

कल-आज आजकल

आज तुम      मेरे सम्मुख हो, मैं तुम्हारे ‘आज’ को ‘कल’ की रोशनी में देखना चाहता हूँ। देखता हूँ तुम्हारे ‘आज का कल’ ‘कल के आज’ से तनिक भी संगति नहीं बैठाता। कल-आज आजकल समझ में नहीं आते मुझे।

Article, Article on Authors, Literary Classics, Ramyantar, आलेख

कहानी कैसे बनी (कर्तार सिंह दुग्गल के जन्म दिवस पर)

पिताजी की संग्रहित की हुई अनेकों किताबों में एक है ‘कहानी कैसे बनी’। उसे महीनों पहले पढ़ना शुरु किया था। कुल आठ कहानियों की यह किताब मुझे अविश्वसनीय रचनाधर्मिता का उदाहरण लगी। मैंने इसे पूरा का पूरा पढ़ तो लिया…