Ramyantar, Religion and Spirituality

पर्यावरण के प्रति प्रेम का अनूठा प्रतीक-बंधन

राखी बीत गयी । बहुत कुछ देखा, सुना, अनुभूत किया – पर एक दृश्य अनावलोकित रह गया, एक अनुभव फिसल गया । मेरे कस्बे सकलडीहा के बहुत नजदीक के एक गाँव की दो बच्चियों ने रक्षाबंधन पर राखी बाँधी ,…

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मैं चिट्ठाकार हूँ, पर…

मैं चिट्ठाकार हूँ, पर अनूप शुक्ल जैसा तो नहीं , जिनकी लेखनी उनके प्राचुर्य का प्रकाश है । यह प्राचुर्य का प्रभाव ही है न, जिससे मानव अपने को अभिव्यक्त करता है । वह अपने को बहुतों में, क्षुद्र को…

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मैथिली शरण गुप्त के जन्मदिवस (3 अगस्त) पर

हिन्दी साहित्य के उज्ज्वल नक्षत्र राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त का जन्मदिवस है कल। प्रस्तुत है उनका प्रसिद्ध और विख्यात गीत, ’सखि वे मुझसे कह कर जाते!’ – पढ़े भी और सुनें भी। सखि, वे मुझसे कहकर जाते, कह, तो क्या…

Ramyantar, कहानी

’गमी’ – प्रेमचंद के जन्मदिवस पर

सर्वकालिक महानतम हिन्दी उपन्यासकार और कहानीकार प्रेमचन्द के जन्मदिवस पर प्रस्तुत है उनकी एक रोचक कहानी – मुझे जब कोई काम – जैसे बच्चों को खिलाना, ताश खेलना,, हारमोनियम बजाना, सड़क पर आने जाने वालों को देखना – नहीं होता…

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तुम्हें कौन प्यार करता है ?

हे प्रेम-विग्रह !एक द्वन्द्व है अन्तर्मन में,दूर न करोगे ? मेरी चेतना के प्रस्थान-बिन्दु परआकर विराजो, स्नेहसिक्त !कि अनमनेपन से निकलकर मैं जान सकूँ कि तुम्हें प्यार कौन करता है ? क्या वह जो अपने प्राणों की वेदी परप्रतिष्ठित करता…

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तुम्हारी याद आती है चले आओ, चले आओ (तुलसी जयंती पर तुलसी-स्मरण )

आज तुलसी जयंती है । इन पंक्तियों के साथ इस विराट पुरुष का स्मरण कर रहा हूँ – अहो, नंदन विपिन की विटप छाया में विराजित कविमुरलिका बन्द कर दो छेड़ना अब रुद्र रव लाओप्रलय है पल रहा हर घर…

Ramyantar, वृक्ष-दोहद

सुकुमारी ने छुआ और खिल उठा प्रियंगु (वृक्ष-दोहद के बहाने वृक्ष-पुष्प चर्चा)

प्रियंगु! यथा नाम तथा गुण। काव्य रसिकों और औषधि विज्ञानियों दोनों का प्रिय। कालिदास इसकी सुगंध के सम्मोहन में हैं। ऋतुसंहार में सुगंधित द्रव्यों के साथ इस पुष्प का वर्णन है। चरक जैसे औषधि विज्ञानी भी इसे खूब चाहते हैं।…

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आज मिललैं श्याम सावनी विहान में (कजरी 3)

नाग-पंचमी की शुभकामनाओं सहित कजरी की इस प्रस्तुति के साथ यह कजरी-श्रृंखला समाप्त कर रहा हूँ – आज मिललैं श्याम सावनी विहान मेंमाधवी लतान में ना ! नियरे कनखी से बोलवलैंसिर पै पीत-पट ओढ़वलैं,रस के बतिया कहलैं सटके सखी कान…

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बड़ा लागै नीक सखी ना ..(कजरी 2)

श्याम हसलैं बोललैं बइठ के नजदीक सखीबड़ा लागै नीक सखी ना ॥ चमकै लिलरा जस अँजोरियादमकै बिजुरी अस दँतुरिया,मोहे अधरन कि लाल लाल लीक सखीबड़ा लागै नीक सखी ना । बड़री अँखिया कै पुतरियामुख पै लटके लट लटुरिया,जइसे धाये मधु…

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बीतल जात सवनवाँ ना …(कजरी – 1)

सावन आया । आकर जा भी रहा है । मैंने कजरी नहीं सुनी, न गायी । वह रिमझिम बारिश ही नहीं हुई जो ललचाती । उन पुराने दिनों की मोहक याद ही थी जो बारिश की जगह पूरे सावन बरसती…