Category

Poetry

Poetry, Ramyantar

वह डोर ही नहीं बुन पा रहा हूँ

मैं जिधर भी चलूँ मैं जानता हूँ कि राह सारी तुम्हारी ही है, पर यह मेरा अकिंचन भाव ही है कि मैं नहीं चुन पा रहा हूँ अपनी राह। मैंने बार-बार राह की टोह ली पर चला रंच भर भी…

Poetry, Ramyantar

एक दिन ब्रह्मा मिल जाते…

एक दिन ब्रह्मा मिल जाते तो उनसे पूछता कुछ प्रश्न और अपनी जिज्ञासा शांत करता कि क्यों नहीं पहुंचती उन तक किसी की चीख? उनसे पूछता कि जिसका तना मजेदार, खूब रसभरा है फलदार क्यों नहीं हो गयी वह ईख…

Poetry, Ramyantar

एक स्त्री के प्रति

स्वीकार कर लिया काँटों के पथ को पहचाना फ़िर भी जकड़ लिया बहुरूपी झूठे सच को कुछ बतलाओ, न रखो अधर में हे स्नेह बिन्दु! क्यों करते हो समझौता? जब पूछ रहा होता हूँ, कह देते हो ‘जो हुआ सही…

Poetry, Ramyantar

मधु की तरह घुलता जा रहा हूँ मैं

नये वर्ष के आगमन पर बहुत कुछ संजोया है मन में। सम्भव है नए साज बनें हृदय के अनगिन स्नेहिल तार जुडें मन का रंजन हो उल्लसित हर अकिंचन हो स्वप्न अवसित धरा पर मधुरिम यथार्थ का स्यंदन हो। विचारता…

Poetry, Ramyantar, Songs and Ghazals

स्नेहिल मिलन की सीख दे दो

फ़ैली हुई विश्वंजली में, प्रेम की बस भीख दे दो विरह बोझिल अंत को स्नेहिल मिलन की सीख दे दो। चिर बंधनों को छोड़ कर क्यों जा रही है अंशु अब अपनी विकट विरहाग्नि क्यों कहने लगा है हिमांशु अब…

Poetry, Ramyantar, Songs and Ghazals

परिवर्तन आने वाला है

बज गयी दुन्दुभि, परिवर्तन आने वाला है। है निस्सीम अगाध अकल्पित, समय शून्य का यह विस्तार प्रिय देखो वह चपल विहंगम चला जा रहा पंख पसार ‘काल अमर है’ का संकीर्तन यही विहग गाने वाला है। वह देखो गिर रहे…

Poetry, Ramyantar, Songs and Ghazals

मैं, मैं अब नहीं रहा

मैं, मैं अब नहीं रहा, तुम ही तो हूँ। बहुत भटकता रहा खोजता अपने हृदय चिरंतन तुमको जो हर क्षण आछन्न रहे ओ साँसों के चिर बंधन तुमको, मैं जाग्रत अब नहीं रहा, गुम ही तो हूँ। मैं, मैं अब…

Love Poems, Poetry, Ramyantar

क्यों न मेरा यह हृदय मूक-सा रहने दिया

क्यों न मेरा यह हृदय मूक-सा रहने दिया? क्या करुँ उस अग्नि का निशि-दिन जले जो इस हृदय में क्या करुँ उस व्यग्रता का जा छिपी जो उर-निलय में क्यों असीमित यह प्रणय बहु-रूप सा रहने दिया? तारकों की तूलिका…

Poetry, Ramyantar

कहाँ हो मेरे मन के स्वामी आओ

कहाँ हो मेरे मन के स्वामी आओ, मैं हूँ एक अकिंचन जग में प्रेम-सुधा बरसाओ। आज खड़ा है द्वार तुम्हारे तेरी करुणा का यह प्यासा दृष्टि फेर दो कुछ तो अपनी दे दो अपना स्नेह दिलासा हे मेरे जीवनधन मुझको,…

Poetry, Ramyantar, Songs and Ghazals

माँ तुम गंगाजल होती हो

अभी-अभी पूजा उपाध्याय जी के ब्लॉग से लौट रहा हूँ। एक कविता पढ़ी- माँ के लिए लिखी गयी। मन सम्मोहित हो गया। पूजा जी की कविता से जेहन में एक कविता की स्मृति तैर गयी। छुटपन में बाबूजी ने पढ़ने…