सच्चा शरणम्
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सम्हलो कि चूक पहली इस बार हो न जाये(गज़ल)

सम्हलो कि चूक पहली इस बार हो न जाये
सब जीत ही तुम्हारी कहीं हार हो न जाये।

हर पग सम्हल के रखना बाहर हवा विषैली
नाजुक है बुद्धि तेरी बीमार हो न जाये।

अनुकूल कौन-सा तुम मौका तलाशते हो
जागो, कहीं तुम्हारी भी पुकार हो न जाये।

हर रोज जिन्दगी को रखना चटक सुगंधित
गत माह का पुराना अखबार हो न जाये।

खोना न होश, दौड़े जिस घर में जा रहे हो
तुम्हें देख बन्द उसका कहीं द्वार हो न जाये।

8 comments

  1. हाँ ये सारे डर तो हैं -सावधान रहना होगा क्या ?

  2. खोना न होश, दौड़े जिस घर में जा रहे हो
    तुम्हें देख बन्द उसका कहीं द्वार हो न जाये

    वाह हिमांशु अंकल, आपने तो बडे पते की बात कही.

  3. खोना न होश, दौड़े जिस घर में जा रहे हो
    तुम्हें देख बन्द उसका कहीं द्वार हो न जाये ।
    ……….सुंदर प्रभावशाली पंक्तियाँ।

  4. हर रोज जिन्दगी को रखना चटक सुगंधित
    गत माह का पुराना अखबार हो न जाये ।

    लाजवाब शेर है………..
    और ग़ज़ल तो पूरी ही khoobsoorat है

  5. खोना न होश, दौड़े जिस घर में जा रहे हो
    तुम्हें देख बन्द उसका कहीं द्वार हो न जाये । aajkal yahi to ho raha hai….satya hai…

  6. हर रोज जिन्दगी को रखना चटक सुगंधित
    गत माह का पुराना अखबार हो न जाये ।
    बहुत अच्छा कहा है…ग़ज़ल में मुझे बहर का दोष लगता है…किसी उस्ताद को दिखालें…
    नीरज

  7. सावधान करने वाली सुंदर रचना!

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