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पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-6

साहित्य क्यों ? (Why Literature ?) : मारिओ वर्गास लोसा (Mario Vargas Llosa) प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख का हिन्दी रूपान्तर । ‘लोसा’ साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा…

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पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-5

साहित्य क्यों ? (Why Literature ?) : मारिओ वर्गास लोसा (Mario Vargas Llosa) प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख का हिन्दी रूपान्तर । ‘लोसा’ साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा…

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पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-4

साहित्य क्यों? (Why Literature?): मारिओ वर्गास लोसा (Mario Vargas Llosa) प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख का हिन्दी रूपान्तर । ‘लोसा’ साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते…

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पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book)-3

साहित्य क्यों ? (Why Literature ?) : मारिओ वर्गास लोसा (Mario Vargas Llosa) प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख का हिन्दी रूपान्तर । ‘लोसा’ साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा…

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पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The Premature Obituary of the Book) – 2

साहित्य क्यों? (Why Literature ?):मारिओ वर्गास लोसा (Mario Vargas Llosa) प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख का हिन्दी रूपान्तर । ‘लोसा’ साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते…

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पुस्तक को असमय श्रद्धांजलि (The premature obituary of the book)

साहित्य क्यों? (Why Literature?) : मारिओ वर्गास लोसा (Mario Vargas Llosa) प्रस्तुत है पेरू के प्रख्यात लेखक मारिओ वर्गास लोसा के एक महत्वपूर्ण, रोचक लेख का हिन्दी रूपान्तर। ‘लोसा’ साहित्य के लिए आम हो चली इस धारणा पर चिन्तित होते…

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यह कैसे हुआ मीत….

‘मोहरे वही, बिसात भी वही और खिलाड़ी भी…/ यह कैसे हुआ मीत /….’ बहुत पहले सुना था इस गीत को । कोशिश की, गीतकार का नाम पता चल जाय पर जान न सका उस वक्त । कुछ लोगों ने कहा,…

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अनुभूति..

आज देखा तुम्हें अन्तर के मधुरिल द्वीप पर ! निज रूपाकाश में मधुरिम प्रभात को पुष्पायित करती, हरसिंगार के कुहसिल फूल-सी, प्रणय-पर्व की मुग्ध कथा-सी बैठी थीं तुम ! अपने लुब्ध नयनों से ढाँक कर ताक रहा था तुम्हें !…

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कौन-सी वह पीर है ?

विकल हूँ, पहचान लूँ मैं कौन-सी वह पीर है ! अभीं आया नहीं होता वसन्त तभीं उजाड़ क्यों हो जाती है वनस्थली, क्यों हवा किसी नन्दन-वन का प्रिय-परिमल बाँटती फिरती है गली-गली, और किसी सपनीली  रात में क्यों कोयल चीख-चीख…