सच्चा शरणम्
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सौन्दर्य लहरी-8

Shankaracharya

’सौन्दर्य-लहरी’ संस्कृत के स्तोत्र-साहित्य का गौरव-ग्रंथ व अनुपम काव्योपलब्धि है । आचार्य शंकर की चमत्कृत करने वाली मेधा का दूसरा आयाम है यह काव्य । निर्गुण, निराकार अद्वैत ब्रह्म की आराधना करने वाले आचार्य ने शिव और शक्ति की सगुण रागात्मक लीला का विभोर गान किया है ’सौन्दर्य-लहरी’ में । उत्कंठावश इसे पढ़ना शुरु किया था, सुविधानुसार शब्दों के अर्थ लिखे, मन की प्रतीति के लिये सस्वर पढ़ा, और भाव की तुष्टि के लिये हिन्दी में इसे अपने ढंग से गढ़ा । अब यह आपके सामने प्रस्तुत है । ’तर्तुं उडुपे नापि सागरम्’ – सा प्रयास है यह । अपनी थाती को संजो रहे बालक का लड़कपन भी दिखेगा इसमें । सो इसमें न कविताई ढूँढ़ें, न विद्वता । मुझे उचकाये जाँय, उस तरफ की गली में बहुत कुछ अपना अपरिचित यूँ ही छूट गया है । उमग कर चला हूँ, जिससे परिचित होउँगा, उँगली पकड़ आपके पास ले आऊँगा। जो सहेजूँगा,यहाँ लाकर रख दूँगा। पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठीं, सातवीं के बाद आज आठवीं कड़ी

सुधामप्यास्वाद्य प्रतिभय जरा मृत्यु हरिणीं 
विपद्यंते विश्वे विधि शतमखाद्या दिविषदः।
करालं यत् क्ष्वेलं कबलितवतः कालकलना
न शंभोस्तन्मूलं  तव जननि ताटंक महिमा ॥२८॥

पीयूष का भी पान कर
जो जरा मृत्यु भयापहारी
विधि सुराधिप देवगण भी
त्याग करते प्राण का हैं
किन्तु गहन कराल पी भी
शिव न होते कालकवलित
यह तुम्हारे श्रवणद्वार अलंकरण
ताटंक की ही है विशद महिमा
परम सौभाग्यप्रद शिव को
जननि हे! ॥28॥
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किरीटं वैरिच्यं परिहर पुरः कैटभभिदः 
कठोरे कोटीरे स्खलसि जहि जंभारि मुकुटम् । 
 प्रणम्रेष्वेतेषु प्रसभमुपयातस्य भवनं
भवस्याभ्युत्थाने तव परिजनोक्तिर्विजयते॥२९॥

“दूर तुम कर दो विधाता
मुकुट अपने भाल से अब
दो हटा हरि कैटभारि
किरीट कठिन कठोर सिर से
जम्भ अरि देवेन्द्र तुम भी
पृथक कर दो मुकुट सिर से
अब पधार रहे उमापति शंभु ” –
यह उनके नमन के समय में
जब वे तुम्हारे चरण में प्रणिपात करते,
शंभु अभ्युत्थान क्षण में
जननि तेरे परिजनों की
विजयिनी हो यह गिरा गंभीर
नित शिवसंगिनी हे!  ॥29॥
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चतुः षष्ट्या तंत्रैः सकलमतिसंधाय भुवनं 
स्थितस्ततत्  सिद्धि प्रसव परतंत्रैः पशुपतिः ।
पुनस्त्वन्निर्बंधादखिल पुरुषार्थैक घटना 
स्वतंत्रं ते तंत्रं क्षितितलमवातीतरदिदम् ॥३०॥

सिद्धिकामी मानवों हित
तंत्र चौंसठ रच जगत में
तंत्र सिद्धि विधान से
उलझा दिया पशुनाथ शिव ने
पुनः ले आदेश तेरा
जो अखिल पुरुषार्थ दाता
तंत्र त्रिपुरागम तुम्हारा
माँ !
कर दिया है परम शिव ने
प्रकट उसे स्वतंत्र ॥30॥
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शिवः शक्तिः कामः क्षितिरथ रविः शीतकिरणः
स्मरो हंसःशक्रस्तदनु च परा मार हरयः ।
अमी हृल्लेखाभिस्तिसृभिरवसानेषु घटिता
भजंते वर्णास्ते तव जननि नामावयवताम् ॥३१॥

शंभु-शक्ति-अनंग-क्षिति-रवि,
चन्द्रमा-स्मर-हंस-सुरपति,
परा-मनसिज-हरि,
त्रयी इस अंत में फिर जोड़ माया
’हादि’ मंत्र ग्रथित तुम्हारा
वर्णमय अवयव पराम्बा
जप जिसे ब्रह्मादिपद निर्वाण
साधक प्राप्त करते
परम दुर्लभ स्थान
अतिशय सहजता से ही
जननि हे!॥31॥

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