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नवागत प्रविष्टियाँ

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गद्य से उभारनी पड़ रही है बारीक-सी कविता

Himanshu Pandey By Himanshu Pandey

छंदों से मुक्त हुए बहुत दिन हुए कविता ! क्या तुम्हारी साँस घुट सी नहीं गई ? मैंने देखा है…

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रवीश कुमार के ‘क़स्बा’ की चर्चा: क़स्बा की प्रविष्टियों का सन्दर्भ

Himanshu Pandey By Himanshu Pandey

मैं रवीश कुमार के कस्बे (क़स्बा- रवीश कुमार का ब्लॉग) का ज़िक्र करना चाहता हूँ। यह कस्बा भी मेरे कस्बे…

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जो कर रहा है यहाँ पुरुष (कविता)

Himanshu Pandey By Himanshu Pandey

राजकीय कन्या महाविद्यालय के ठीक सामनेसंघर्ष अपनी चरमावस्था में है,विद्रूप शब्दों से विभूषित जिह्वा सत्वर श्रम को तत्पर है,कमर की…