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मैं एक ब्लॉग टिप्पणी हूँ। अब टिप्पणी ही हूँ तो कितना कहूं। उतना ही न जितना प्रासंगिक हो, तो इतना कह लेती हूँ शुरू शुरू में कि मैं ब्लॉग प्रविष्टि से अलग हूँ। अलग इस अर्थ में कि मुझे देख कर, पढ़ कर ब्लागर के मन में बहुत कुछ लगने लगता है। बड़ी बात तो यह है कि प्रत्येक ब्लागर के लिए यह लगना अलग है । अलग समझते हैं न। अ-लग अर्थात जो न लगे। फ़िर लगे भी और न भी लगे- कितना विकराल द्वैत है? यही द्वैत तो मेरा परिचय है।
अब परिचय दे ही दिया है तो कुछ और बता दूँ। मेरा जन्म उसी नियंता (ब्लॉगर) के मन के अभ्यास का परिणाम है जिससे मेरा स्वामी (ब्लॉग-प्रविष्टि) जन्म लेता है। जिस प्रकार अनुभूतियों के परिपार्श्व में भावनात्मक विकलता अभिव्यक्ति से संयोग कर ब्लॉग प्रविष्टि का निर्माण करती है, उसी प्रकार उस अभिव्यक्ति की संवेदना से हुई प्रतिक्रिया मेरा निर्माण करती है।
मैं जन्मना अभागी हूँ। मुझे समझ ही नहीं पाटा कोई। यदि मैं बन-ठन कर कहीं ठौर लगा लूँ तो इसे कुवृत्तिगामिनी नारी का स्वभाव मान लिया जाता है। कहा जाता है कि मैं केवल नियंता के मन रंजन के लिए उपस्थित हो गयी हूँ। मेरे आभूषणों (बधाई, धन्यवाद, आभार, अच्छा है, बहुत खूब आदि जैसे शब्द) को दिखावटी अ-स्वर्ण (पीतल आदि) घोषित कर दिया जाता है। सच, तब टूट कर बिखर जाती हूँ मैं। यदि मैं उलाहना लिए कहीं चली जाऊं (आख़िर सद्भाव है मेरा, मेरे स्वामी-ब्लॉग प्रविष्टि से) तो मुझे और मेरे नियंता (ब्लॉगर) को अप्रासंगिक कह धकिया दिया जाता है (प्रकाशित नहीं किया जाता)। पर क्या ऐसे लोगों को नहीं लगता कि उनकी प्रतिष्ठा ही मेरी कलंक-कथा के पाठ पर आधारित है।
अपने अस्तित्व के लिए क्या कहूं? अथवा अपनी प्रकृति के लिए? जो जैसे चाहता है, वैसे मेरा उपयोग करता है । किसी के लिए मैं व्यवहार हूँ- रिश्तेदारी का सबब, मेलजोल का उपकरण। किसी के लिए व्यापार हूँ- एक हाँथ दो, दूसरे हाँथ लो का हिसाब या पूंजी से पूंजी का जुगाड़। कभी किसी के लिए अतृप्ति का आत्मज्ञान हूँ तो किसी के लिए उसकी संस्कृति, उसका स्वभाव। मैं सुकृति, विकृति दोनों हूँ। तो इसलिए मैं अपने अस्तित्व के प्रति सजग हूँ- धकियायी जाकर भी, आलोचित होकर भी; क्योंकि (‘अज्ञेय’ के शब्दों में) –

“पूर्णता हूँ चाहता मैं ठोकरों से भी मिले
धूल बन कर ही किसी के व्योम भर में छा सकूँ।”

तो आप समझ गए मैं ‘टिप्पणी’ हूँ। मैं निरंतर लिखी जा रही प्रविष्टियों और इनसे उपजी संभावनाओं से विभोर हूँ। मैं तो बस अपने स्वामी (ब्लॉग-प्रविष्टि) का प्रकाश,प्रसार देखना चाहती हूँ। महाकवि ‘टैगोर’ की पंक्तियाँ दुहरा लूँ- शायद मन को संतोष मिले-

“जो पथे अनंत लोक चलियाछे भीषण नीरवे से पथ प्रान्तेर
एक पार्श्वेर रखो निरखिबो विराट स्वरूप युग-युगान्तरे ।”
(जिस पथ से अनंत जन समुदाय चला जा रहा है, उस पथ के एक पार्श्व में मुझे अकेला खडा करो ताकि मैं युग युग का विराट स्वरूप देख सकूँ।)

बताना जरूरी है: यह ब्लोगरी के माध्यम से साहित्य-विलास मात्र है। इस प्रविष्टि का कोई लक्ष्यार्थ नहीं।